Wednesday, January 14

भ्रष्टाचार रोधी कानून पर सुप्रीम कोर्ट में विभाजन, अब चीफ जस्टिस ही लेंगे अंतिम फैसला

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17 की संवैधानिक वैधता पर खंडित निर्णय सुनाया। यह धारा लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेने की शर्त से जुड़ी है। अदालत में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन के मत अलग-अलग रहे।

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जस्टिस नागरत्ना का मत

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि जांच शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति की शर्त अधिनियम के उद्देश्य के खिलाफ है। इससे भ्रष्ट लोकसेवकों को संरक्षण मिलता है और ईमानदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में रुकावट आती है।

जस्टिस विश्वनाथन का मत

वहीं, जस्टिस केवी विश्वनाथन ने धारा 17ए को संवैधानिक मानते हुए कहा कि यह प्रावधान तभी सुरक्षित है जब मंजूरी लोकपाल या राज्य के लोकायुक्त से ली जाए। इससे ईमानदार अधिकारियों की रक्षा होगी और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सजा सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था प्रशासनिक ढांचे में श्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करने में मदद करती है।

अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अलग-अलग मतों को देखते हुए इस मामले को प्रधान न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) सूर्यकांत के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। अब एक विशेष पीठ का गठन कर इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

केस की पृष्ठभूमि

यह मामला एनजीओ ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (CPIL) की जनहित याचिका पर आधारित है, जिसमें धारा 17ए की वैधता को चुनौती दी गई थी। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करता है क्योंकि अक्सर सरकार से अनुमति नहीं मिलती। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार मामलों में जांच की स्वतंत्रता और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन तय करेगा।

 

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