
नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के नौवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि वाद–विवाद, चर्चा, असहमति और यहां तक कि टकराव भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी प्रक्रियाओं का अंततः निष्कर्ष पर पहुंचना और उसके कार्यान्वयन में सहयोग करना जरूरी है।
जेएनयू में उपराष्ट्रपति की प्रमुख बातें
- राधाकृष्णन ने स्नातक छात्रों से अपने ज्ञान और कौशल को राष्ट्र सेवा में समर्पित करने का आग्रह किया।
- उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उपदेशों को याद करते हुए कहा कि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि चरित्र निर्माण, बौद्धिक क्षमता और व्यक्तियों के सशक्तिकरण पर भी जोर देना चाहिए।
- उपनिषदों, भगवद् गीता, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुवल्लुवर के तिरुक्कुरल का उदाहरण देते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि भारतीय धर्मग्रंथ और शास्त्र शिक्षा को सामाजिक और नैतिक जीवन के केंद्र में रखते हैं।
पीएम मोदी के विकसित भारत के विज़न का जिक्र
उपराष्ट्रपति ने बताया कि केवल शिक्षा और उचित प्रशिक्षण ही भारत के युवाओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक विकसित भारत के सपने को साकार करने में सक्षम बना सकते हैं। उन्होंने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान की सभ्यतागत परंपरा हमेशा प्रेरणादायक रही है।
ग्रेजुएट्स से तीन अहम जिम्मेदारियों की अपील
- सत्य की तलाश में बौद्धिक ईमानदारी बनाए रखना।
- सामाजिक असमानताओं को कम करने और समावेश बढ़ाने में योगदान देना।
- राष्ट्रीय विकास में सक्रिय भागीदारी और संवैधानिक मूल्यों का पालन करना।
इसके साथ ही उन्होंने छात्रों से हमेशा माता–पिता और शिक्षकों का सम्मान करने और भारतीय सभ्यता की नैतिक परंपराओं से निर्देशित होने का आग्रह किया।