Tuesday, January 13

Oil Vs Tariff: रूस से तेल आयात पर अमेरिका ने बढ़ाया दबाव, भारत के सामने रणनीतिक चुनौती

नई दिल्ली: भारत इस समय एक जटिल ऊर्जा और वैश्विक व्यापार रणनीति के बीच फंसा हुआ है। वह न तो रूस से तेल खरीदना छोड़ सकता है, और न ही अमेरिका की टैरिफ की धमकियों को नजरअंदाज कर सकता है। इस द्वंद्व में देश की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हित और भू-राजनीतिक संतुलन सभी दांव पर हैं।

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अमेरिकी टैरिफ का खतरा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। इसके अलावा, ईरान जैसे ट्रेड पार्टनरों पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान भी किया गया है। अमेरिका ने भारत पर भी इसी प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लागू करने का इशारा किया है।

नव नियुक्त अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने नई दिल्ली में पदभार ग्रहण के बाद कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता फिर से शुरू हो सकती है। उन्होंने बताया कि यह साझेदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच विश्वास पर आधारित है।

 

भारत-चीन पर अमेरिका की निगरानी

तेल अब केवल ईंधन नहीं रहा, बल्कि वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति का महत्वपूर्ण हथियार बन गया है। अमेरिका ने रूस के तेल आयातकों को आर्थिक परिणामों की चेतावनी दी है, जिससे भारत और चीन पर कड़ी नजर बनी हुई है।

पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पारित द्विदलीय प्रतिबंध विधेयक के तहत, भारत जैसे रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है। इस दबाव के चलते भारत ने रूस से तेल आयात कुछ हद तक कम कर दिया है, ताकि वैश्विक प्रतिबंधों और व्यापार अस्थिरता के बीच संतुलन बना रहे।

 

भारत की रणनीति और वैश्विक तेल बाजार

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश की लगभग 90 प्रतिशत तेल जरूरतें आयात पर निर्भर हैं। तेल की कीमतों और उपलब्धता में मामूली बदलाव भी अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति और सरकारी वित्त पर असर डाल सकते हैं।

रूस भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। 2022 से अब तक भारत ने 140 अरब यूरो से अधिक का रूसी कच्चा तेल खरीदा है। यह रिफाइनरियों की लागत कम करने और घरेलू ईंधन कीमतों को स्थिर रखने में मदद करता है।

 

वेनेजुएला से तेल खरीद का अमेरिका का प्रस्ताव

अमेरिका ने भारत को वेनेजुएला का तेल बेचने के लिए तैयार होने का संकेत दिया है। इस कदम के पीछे उद्देश्य रूस से तेल खरीद पर दबाव बनाना और वैश्विक तेल आपूर्ति में अमेरिकी प्रभाव बढ़ाना है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका और वेनेजुएला के बीच लगभग 2 अरब डॉलर मूल्य के कच्चे तेल समझौते का हवाला दिया।

अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस्टोफर राइट के अनुसार, भारत या तो अमेरिका के साथ मिलकर तेल खरीद सकता है या विकल्प न चुनते हुए तेल प्रवाह और राजस्व पर अमेरिकी नियंत्रण स्वीकार कर सकता है।

 

तेल अब सिर्फ व्यापार नहीं, रणनीति बन गया

तेल अब भारत के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक मुद्दा बन गया है। वैश्विक प्रतिबंधों, टैरिफ दबाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की ऊर्जा नीति पर जटिल परिस्थितियों का प्रभाव पड़ रहा है।

इस स्थिति में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा या अमेरिका के दबाव में रणनीति बदलेगा।

 

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