
रीवा। यह कहानी है रीवा के नीरज कुमार सिंह की, जो एक इंजीनियर होने के बावजूद, अपनी नौकरी छोड़कर प्राकृतिक खेती से न केवल अपनी ज़िंदगी को नया दिशा दे रहे हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए एक नई राह भी बना रहे हैं। नीरज कुमार सिंह, जिनके पास मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स डिग्री और एक शानदार कॉर्पोरेट नौकरी थी, ने 2014 में अपनी नौकरी छोड़ दी और मध्य प्रदेश के रीवा में प्राकृतिक खेती शुरू कर दी।
प्राकृतिक खेती से ‘सोना’ उगा रहे नीरज
नीरज सिंह ने रासायनिक खादों और कीटनाशकों से बचते हुए गाय के गोबर और मूत्र से बने पंचगव्य और जीवामृत जैसे प्राकृतिक उर्वरकों का इस्तेमाल कर खेती की। उनका मानना है कि प्रकृति से जुड़े रहकर ही असली समृद्धि मिलती है। नीरज की मेहनत का फल अब उन्हें मिल रहा है। वह प्रति एकड़ 2 से 3 गुना ज्यादा उपज प्राप्त कर रहे हैं। इसके अलावा, वह सोना मोती गेहूं और बुद्ध चावल जैसी प्राचीन किस्मों की खेती भी कर रहे हैं।
एक्स्ट्रा इनकम ₹75,000 प्रतिमाह
नीरज अब 3 एकड़ अपनी जमीन और 25 एकड़ लीज पर ली हुई ज़मीन पर खेती करते हैं। गायों से प्राकृतिक उर्वरक प्राप्त होने के साथ-साथ उन्हें दूध और दूध उत्पादों से हर महीने ₹75,000 की अतिरिक्त आय भी हो रही है। इस आय के कारण उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है और वह खेती से सशक्त जीवन जी रहे हैं।
परिवार का समर्थन
नीरज कहते हैं, “मेरी पत्नी और बच्चों ने मेरे इस जुनून को समझा और मुझे हर कदम पर साथ दिया। वे जानतें थे कि इस रास्ते में कई कठिनाइयां आएंगी, फिर भी उन्होंने मुझे अपना सपने जीने में पूरा सहयोग किया।”
चुनौतियों से जूझते हुए
प्राकृतिक खेती में कई चुनौतियां हैं, जैसे आवारा पशुओं से फसलों की सुरक्षा और कुशल मजदूरों की कमी। नीरज का मानना है कि इन समस्याओं का समाधान सरकारी एजेंसियों, गैर-लाभकारी संगठनों और किसानों के बीच सहयोग से ही हो सकता है। वे कहते हैं, “प्राकृतिक खेती सिर्फ खाद्य उत्पादन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार, स्वास्थ्य बहाली और किसान के जीवन में गरिमा लौटाने का रास्ता है।”
युवाओं के लिए प्रेरणा
नीरज का फार्म आज कई युवा किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। वह मानते हैं कि भविष्य आज के स्मार्ट समाधानों और अतीत के ज्ञान के संयोजन में है। नीरज कहते हैं, “मैं तकनीक या आधुनिक प्रथाओं के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन मेरा मानना है कि हमारा भविष्य हमारे अतीत के ज्ञान को आज के समाधान के साथ जोड़ने में है।”