Saturday, January 10

10,000 साल बाद ग्रोथ की नई कहानी लिख रहा तांबा: क्यों बढ़ रही कीमत और कहां तक पहुंच सकती है रेट?

सोने और चांदी की तरह ही तांबा भी अब निवेशकों और उद्योग जगत का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। हाल ही में तांबे की कीमतें ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच गई हैं। पिछले साल तांबे में करीब 60% की तेजी दर्ज की गई। एमसीएक्स पर 29 दिसंबर को इसका भाव लगभग 1,400 रुपये प्रति किलो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 6 जनवरी को 6.069 डॉलर प्रति पौंड तक पहुंच गया।

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मांग बढ़ी, सप्लाई तंग

तांबे की कीमत में तेजी के पीछे मुख्य कारण इसकी मजबूत मांग और कम सप्लाई है।

  • मांग: AI डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ और बिजली ग्रिड के विस्तार जैसी नई तकनीकों में तांबे का उपयोग बढ़ा है। चीन और भारत में बिजली और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की मजबूत मांग भी इसका कारण है।
  • सप्लाई में बाधा: चिली की खानों में हड़तालें, डीआर कांगो और इंडोनेशिया की खानों में उत्पादन में रुकावटें, और नई खानों की उच्च लागत ने सप्लाई को घटाया है। LME में तांबे का स्टॉक 142,550 टन रह गया है, जो पिछले साल के मुकाबले सबसे कम है।

अमेरिका और भूराजनीतिक प्रभाव

अमेरिका ने तांबे को रणनीतिक धातु घोषित किया है। संभावित टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव ने कीमतों में प्रीमियम जोड़ दिया है। COMEX में स्टॉक बढ़ा है, जबकि लंदन और शंघाई जैसे प्रमुख बाजारों में सप्लाई तंग बनी हुई है।

भारत में उत्पादन और मांग

भारत में मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में तांबे की खदानें हैं। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड देश में उत्पादन करती है, लेकिन देश की 90% तांबे की जरूरत आयात से पूरी होती है। 2024-25 में भारत में तांबे का उत्पादन 5 लाख टन था, जबकि मांग 18 लाख टन रही। अनुमान है कि 2030 तक यह मांग 32.4 लाख टन और 2047 तक 98 लाख टन से अधिक हो सकती है।

भविष्य की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यम अवधि में तांबे की कीमतें 15,000 डॉलर प्रति टन तक पहुँच सकती हैं। सप्लाई में कमी और उद्योगों में बढ़ती मांग इसे निवेश के लिए आकर्षक बनाती है। चांदी की तरह यह “नया चांदी” कहलाने लगा है, लेकिन चांदी की तरह निवेश की भूमिका नहीं निभा सकता। फिर भी, करीब 10,000 साल बाद तांबा एक बार फिर वैश्विक विकास की नई कहानी लिखने को तैयार है।

 

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