
वॉशिंगटन/कोपेनहेगन।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने संबंधी बयानबाजी के बाद अमेरिका और डेनमार्क के बीच राजनयिक तनाव गहराता जा रहा है। डेनमार्क ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि ग्रीनलैंड पर किसी भी प्रकार का सैन्य हमला हुआ, तो वह अपने क्षेत्र की रक्षा करेगा। इस चेतावनी ने NATO देशों के बीच अभूतपूर्व टकराव की आशंका को जन्म दे दिया है।
डेनमार्क के सांसद और संसद की रक्षा समिति के अध्यक्ष रासमस जारलोव ने कहा है कि अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर हमला किया जाना स्वीकार्य नहीं होगा। उन्होंने साफ किया कि डेनमार्क अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए जवाब देने को मजबूर होगा, भले ही सैन्य संतुलन अमेरिका के पक्ष में क्यों न हो।
NATO देशों के बीच युद्ध का खतरा
एनडीटीवी को दिए एक विशेष साक्षात्कार में रासमस जारलोव ने कहा,
“हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारे ऊपर सैन्य हमला मंजूर नहीं है। ऐसा हुआ तो दो NATO देशों के बीच युद्ध जैसी अजीब और खतरनाक स्थिति पैदा हो जाएगी, जो पूरी तरह विनाशकारी और अत्यंत मूर्खतापूर्ण कदम होगा।”
उन्होंने माना कि डेनमार्क की सेना के लिए अमेरिका जैसी महाशक्ति को रोकना आसान नहीं होगा, लेकिन देश हमले का जवाब जरूर देगा।
अमेरिका के पास पहले से है पहुंच
जारलोव ने यह भी कहा कि अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड पर हमला करने की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि डेनमार्क और अमेरिका के बीच पहले से रक्षा समझौता मौजूद है, जिसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य और खनन गतिविधियों की अनुमति प्राप्त है।
उन्होंने कहा, “जब पहले से सब कुछ संभव है, तो फिर कब्जे की जरूरत क्यों? हमें उम्मीद है कि यह मामला और आगे नहीं बढ़ेगा।”
ग्रीनलैंड क्यों है रणनीतिक रूप से अहम
ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित डेनमार्क का एक स्वायत्तशासी द्वीप है, जहां लगभग 57 हजार लोगों की आबादी है। यह द्वीप खनिज संसाधनों से भरपूर है और आर्कटिक में इसकी स्थिति इसे वैश्विक सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम बनाती है।
राष्ट्रपति ट्रंप इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताते रहे हैं और पहले भी इसे खरीदने का प्रस्ताव दे चुके हैं, जिसे डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने सिरे से खारिज कर दिया था।
‘ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं’
डेनमार्क के नेताओं ने दो टूक कहा है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है।
रासमस जारलोव ने कहा,
“यह कीमत का नहीं, बल्कि लोगों का सवाल है। हम 57 हजार डेनिश नागरिकों को अमेरिकी बनने के लिए नहीं बेच सकते। ग्रीनलैंड के लोगों ने यह बहुत साफ कर दिया है।”
इस बीच डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने भी चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई की, तो यह NATO के भविष्य के लिए घातक साबित हो सकता है।
व्हाइट हाउस का रुख
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा है कि ग्रीनलैंड को लेकर वॉशिंगटन में सभी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है, जिनमें सैन्य बल का इस्तेमाल भी शामिल है। इस बयान ने यूरोप में चिंता और बढ़ा दी है।
बढ़ती वैश्विक चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच बढ़ता टकराव केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह NATO की एकता और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।