Saturday, January 10

कांग्रेस की काली सियासत ने निगल ली सीएम की कुर्सी: भोला पासवान शास्त्री की कहानी

 

This slideshow requires JavaScript.

 

पटना: बिहार के दिग्गज नेता भोला पासवान शास्त्री तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। हालांकि कांग्रेस की गुटबाजी और कुटिल सियासत के कारण 9 जनवरी 1972 को उनकी सरकार गिर गई और उनका अंतिम कार्यदिवस रहा। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक घटना की पूरी कहानी।

 

निर्दलीय विधायक से मुख्यमंत्री:

भोला पासवान शास्त्री 2 जून 1971 को तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह बिहार के इतिहास में पहली बार हुआ कि किसी स्वतंत्र (निर्दलीय) विधायक को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि उनके पास सत्ता के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं था। कांग्रेस ने उन्हें अपने राजनीतिक फायदे के लिए एक कठपुतली मुख्यमंत्री बनाया।

 

कांग्रेस की सियासी चाल और दबाव:

भोला पासवान शास्त्री ने 1969 में लोकतांत्रिक कांग्रेस दल के टिकट पर कोढ़ा (अब कटिहार) सीट से चुनाव जीतकर राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी। लेकिन जून 1971 तक उनके दल के अन्य 8 विधायकों ने उनका साथ छोड़ दिया। कांग्रेस (R) में विधायकों के पाले बदलने की होड़ ने उन्हें मजबूर किया। 118 विधायकों वाली कांग्रेस ने उनके मुख्यमंत्री बनने का फैसला किया, लेकिन वे पूरी तरह से शक्तिहीन रहे।

 

जांच आयोग को भंग करने का दबाव:

कर्पूरी ठाकुर सरकार ने मई 1971 में भारत सेवक समाज कोष घोटाले की जांच के लिए जस्टिस दत्ता आयोग का गठन किया था। कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र गुट ने शास्त्री पर दबाव बनाया कि वे आयोग भंग करें। भारी दबाव और धमकियों के चलते शास्त्री ने आयोग भंग कर दिया, जिससे सीपीआई ने सरकार का समर्थन वापस ले लिया।

 

अल्पमत में और इस्तीफा:

कांग्रेस की तीन गुटों—ललित नारायण मिश्र गुट, रामलखन सिंह यादव गुट और दारोगा प्रसाद राय गुट—की अंदरूनी सियासत और लगातार दबाव के चलते शास्त्री ने 27 दिसंबर 1971 को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वैकल्पिक सरकार न बन पाने के कारण 9 जनवरी 1972 को विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

 

राजनीतिक संदेश:

भोला पासवान शास्त्री की सरकार का पतन कांग्रेस की सत्ता लालसा और गुटबाजी का एक काला अध्याय साबित हुआ। उनके संघर्ष और मजबूरी ने बिहार की राजनीति में भरोसे और सियासत की जटिलताओं को उजागर किया।

 

Leave a Reply