Thursday, May 14

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प्रेमानंद महाराज ने देह त्यागने के बाद की स्थिति का किया जिक्र, शिष्यों के लिए दिया मार्गदर्शन

 

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मथुरा (उत्तर प्रदेश), 9 जनवरी 2026: पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज ने हाल ही में एक सत्संग के दौरान शिष्यों के मन में उठने वाले एक गहरे सवाल का समाधान किया। एक शिष्य ने उनसे पूछा, “महाराज जी, आपके देह त्याग के बाद हमारी क्या स्थिति होगी और हमारे लिए आपकी क्या आज्ञा रहेगी?” इस पर प्रेमानंद जी महाराज ने शिष्यों को सरल और मार्गदर्शक शब्दों में जवाब देते हुए उन्हें जीवन के सत्य को समझाया।

 

गुरु के देह त्याग के बाद ‘नाम और वाणी’ ही सर्वोच्च आदेश है

 

महाराज जी ने बताया कि गुरु का सानिध्य, उनके शरीर रूप में रहने तक ही सर्वोत्तम होता है। गुरु के शरीर त्याग के बाद उस स्थान पर एक रिक्तता उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष दर्शन और संवाद से जो आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है, वह मोबाइल या वीडियो के माध्यम से संभव नहीं हो सकती।

 

महाराज जी ने गुरु के महत्व की तुलना मां से करते हुए कहा, “जैसे बालक के लिए मां का सानिध्य अनिवार्य होता है, वैसे ही साधक के लिए गुरु का मार्गदर्शन संजीवनी के समान होता है।”

 

शिष्य के लिए ‘नाम और वाणी’ की महिमा

 

प्रेमानंद जी महाराज ने आगे कहा कि गुरु के देह त्याग के बाद शिष्यों के लिए उनका सबसे बड़ा आदेश ‘नाम और वाणी’ है। गुरु द्वारा दिया गया मंत्र और उनका नाम जप, साथ ही उनके द्वारा बताई गई साधना पद्धतियों का पालन करना ही शिष्य के लिए सर्वोत्तम मार्ग है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो शिष्य गुरु की बताई हुई साधना पद्धति पर दृढ़ता से चलता है, उसे कभी अकेलापन महसूस नहीं होता।

 

साधना का अभ्यास और परिपक्वता का मार्ग

 

महाराज जी ने साधना के अभ्यास पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधना की प्रारंभिक अवस्था में गुरु का सानिध्य उतना ही आवश्यक है, जितना एक रोगी के लिए डॉक्टर और अस्पताल। यदि साधक से कोई त्रुटि हो जाती है, तो गुरु के सामने उसे स्वीकार करने मात्र से सुधार संभव हो जाता है। लेकिन जब साधना परिपक्व हो जाती है, तब साधक स्वयं उस मार्ग पर चलने लगता है।

 

उन्होंने शिष्यों को प्रेरित करते हुए कहा, “जब तक संत प्रकट हैं, उनके सानिध्य का पूर्ण लाभ उठाना चाहिए। बाद में उनकी वाणी और सिद्धांतों को ही जीवन का आधार बनाना चाहिए। यही सच्ची गुरु सेवा है।”

 

समाप्ति

 

प्रेमानंद जी महाराज के इन शब्दों ने शिष्यों को जीवन में आत्मनिर्भर बनने और गुरु के सिद्धांतों पर चलने का मार्ग दिखाया। उनके इस मार्गदर्शन से शिष्य अपने जीवन में गुरु की वाणी को आत्मसात कर सकते हैं और अपनी साधना के माध्यम से उच्चतम आध्यात्मिक स्तर पर पहुंच सकते हैं।

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