Friday, January 9

पाकिस्तान और तालिबान युद्ध में ‘खलीफा’ बनने चले तुर्की, उल्टे पैर लौटे

 

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पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच तनाव बढ़ने के बीच तुर्की राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की मध्यस्थता की कोशिशें असफल हो गई हैं। तालिबान और पाकिस्तान के बीच वार्ता कई बार अंकारा में कराई गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। अफगान तालिबान अब भारत से मदद लेकर रणनीति आगे बढ़ा रहा है।

 

तालिबान और पाकिस्तानी सेना में टीटीपी को लेकर तनाव:

सीएनएन न्‍यूज18 के मुताबिक विवाद का मुख्य कारण तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के आतंकियों को लेकर है। टीटीपी पाकिस्तानी सेना के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं और लगातार हमले कर रहे हैं। पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान टीटीपी आतंकियों को उसे सौंप दे और डूरंड लाइन पर 5 किमी तक बफर जोन बनाए, सामानों की आवाजाही पर कड़ी नजर रखे तथा अफगान शरणार्थियों को वापस ले।

 

तालिबान का सख्त रुख:

अफगान तालिबानी सरकार ने पाकिस्तान की इन मांगों को ठुकरा दिया है और कहा कि यह देश की संप्रभुता को कमजोर करेगा। तालिबान ने तुर्की, कतर और सऊदी अरब को साफ कर दिया कि वह पाकिस्तानी दबाव की रणनीति को स्वीकार नहीं करेगा।

 

भारत की शरण में तालिबान:

तालिबान अब पाकिस्तानी दबाव से निपटने के लिए भारत के ईरान में बने चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे उसकी कराची पोर्ट पर निर्भरता खत्म हो गई है। इसके अलावा भारत से दवाओं की खेप मंगवाने से तालिबान का सैन्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता मजबूत हो रही है। इस कदम से पाकिस्तानी व्यापारियों को बड़ा झटका लगा है।

 

तुर्की, कतर और सऊदी अरब की कोशिशें विफल:

तुर्की ने कई बार तालिबान पर दबाव डाला और पाकिस्तानी मांगों के लिए लिखित गारंटी देने को कहा, लेकिन तालिबान ने इन सभी प्रयासों को खारिज कर दिया। कतर और सऊदी अरब के मध्यस्थता प्रयास भी असफल रहे, और पाकिस्तान अब अपने दोस्त कतर पर तालिबान का पक्ष लेने का आरोप लगा रहा है।

 

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