
नई दिल्ली। घरेलू शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बुधवार को लगातार तीसरे कारोबारी दिन बाजार लाल निशान में बंद हुआ। पिछले तीन दिनों में बीएसई सेंसेक्स 1,100 अंकों से ज्यादा टूट चुका है, जबकि निफ्टी 50 भी करीब 1 फीसदी नीचे आ गया है। बड़े शेयरों में बिकवाली, बढ़ती भू-राजनीतिक चिंताएं और वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों ने निवेशकों का भरोसा डगमगा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार में साफ दिशा का अभाव है और उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। बाजार की इस गिरावट के पीछे चार प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं—
1. बड़े शेयरों में तेज बिकवाली
इंडेक्स के दिग्गज शेयरों में लगातार हो रही बिकवाली ने बाजार पर सबसे ज्यादा दबाव डाला है। बुधवार को एचडीएफसी बैंक के शेयर 1.7 फीसदी टूट गए, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज 0.4 फीसदी नीचे बंद हुई। ट्रेंट के शेयरों में भी 1.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इससे पहले एक ही दिन में ट्रेंट 8.6 फीसदी और रिलायंस करीब 5 फीसदी तक लुढ़क चुके हैं। इन भारी भरकम शेयरों की चाल का सीधा असर पूरे बाजार पर पड़ा।
Geojit Investments के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. वी. के. विजयकुमार के अनुसार, कुछ चुनिंदा बड़े शेयरों में हलचल पूरे बाजार की दिशा तय कर रही है। डेरिवेटिव और कैश मार्केट में भारी वॉल्यूम से संकेत मिलते हैं कि हालिया गिरावट सेटलमेंट से जुड़ी गतिविधियों का भी नतीजा हो सकती है।
2. वेनेज़ुएला संकट और भू-राजनीतिक तनाव
वैश्विक स्तर पर वेनेज़ुएला में राजनीतिक उथल-पुथल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। वहां के विशाल पेट्रोलियम भंडार और सत्ता संघर्ष को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। 3 जनवरी को अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी की खबरों के बाद भू-राजनीतिक जोखिम और गहरा गया। इन घटनाओं ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा।
3. एशियाई बाजारों से कमजोर संकेत
भारतीय शेयर बाजारों की चाल एशियाई बाजारों की कमजोरी से भी प्रभावित रही। वेनेज़ुएला संकट और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता के बीच जापान समेत कई एशियाई बाजारों में बिकवाली देखने को मिली। चीन द्वारा जापान को कुछ दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से भी क्षेत्रीय बाजारों में दबाव बढ़ा। वैश्विक स्तर पर सतर्कता का माहौल घरेलू निवेशकों के सेंटीमेंट पर भारी पड़ा।
4. कंसॉलिडेशन का दौर और उतार-चढ़ाव का खतरा
तकनीकी संकेतकों के मुताबिक मौजूदा गिरावट किसी बड़ी मंदी की बजाय कंसॉलिडेशन या सुधार का हिस्सा हो सकती है। Emkay Global के जयकृष्ण गांधी का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से निफ्टी में तेजी के लंबे दौर के बाद स्थिरता या सीमित गिरावट का चरण आता है। हाल के 1–1.5 साल का कंसॉलिडेशन पूरा होने के बाद बाजार में फिर तेजी लौटने की संभावना बनती है। हालांकि, निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार निफ्टी को 25,500–25,300 के स्तर पर मजबूत सपोर्ट मिल सकता है, जबकि ऊपर की ओर 28,500 तक जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सेक्टर के लिहाज से फार्मा जैसे चुनिंदा क्षेत्रों में मजबूती के संकेत दिख रहे हैं।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। बाजार की दिशा फिलहाल खबरों और वैश्विक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी, ऐसे में जल्दबाजी में फैसले लेने से बचना ही बेहतर होगा।