Monday, March 30

दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज, इमरान मसूद ने उठाए सवाल

 

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सहारनपुर: दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया है।

 

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि लंबे समय तक विचाराधीन कैदियों को जेल में रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट खुद कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद। ऐसे में जिन आरोपियों पर ट्रायल अभी पूरा नहीं हुआ है, उन्हें जेल में रखना न्याय की भावना के विपरीत है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय संविधान का मूल आधार है और किसी भी फैसले में इसका संतुलित मूल्यांकन होना चाहिए।”

 

इमरान मसूद ने यह भी कहा कि विचाराधीन कैद (Undertrial Detention) एक गंभीर समस्या है। यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रखा जाता है, तो यह न केवल उनके अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत भी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ नागरिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने इसे कठोर बताते हुए सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार समर्थक नेता इसे कानून के दायरे में लिया गया उचित निर्णय बता रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन के बड़े सवाल को सामने ला रहा है। विशेष रूप से UAPA जैसे कड़े कानूनों में जमानत की शर्तें अलग और अधिक सख्त होती हैं।

 

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