
बांदा। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में पुलिस की छवि को शर्मसार करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। एक युवक के अपहरण और उससे 20 लाख रुपये की अवैध वसूली के आरोप में तत्कालीन थानाध्यक्ष समेत छह पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब मुकदमा दर्ज किया जाएगा। यह मामला वर्ष 2023 का है। कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ी है।
पीड़ित कमालुद्दीन, निवासी गांव हरदौली (थाना बबेरू), ने न्यायालय में दिए गए प्रार्थना पत्र में बताया कि 24 सितंबर 2023 को वह अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से फतेहपुर गया था। इसी दौरान सादी वर्दी में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने हथियारों के बल पर उसे जबरन गाड़ी से उतारकर अपनी गाड़ी में बैठा लिया। इसके बाद उसे बांदा के अतर्रा थाने के पास स्थित पुलिस कॉलोनी में 24 से 26 सितंबर तक अवैध रूप से बंदी बनाकर रखा गया।
पीड़ित का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उसे फर्जी मुकदमे में जेल भेजने की धमकी दी और इससे बचाने के नाम पर 20 लाख रुपये की मांग की। परिवार ने किसी तरह कर्ज लेकर यह रकम पुलिस को दी। इसके बाद जब पुलिस को यह जानकारी मिली कि कमालुद्दीन के खाते में तीन लाख रुपये से अधिक जमा हैं, तो उससे दो लाख रुपये और मांगे गए। रकम न मिल पाने पर पुलिस ने उसे 2 किलो 250 ग्राम गांजा और एक अवैध तमंचा रखने के फर्जी आरोप में जेल भेज दिया।
15 दिन जेल में रहा पीड़ित
कमालुद्दीन को करीब 15 दिन जेल में रहना पड़ा। जमानत पर रिहा होने के बाद उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को पत्र भेजकर पूरे मामले की शिकायत की।
डीजीपी के निर्देश पर तत्कालीन क्षेत्राधिकारी गवेंद्र पाल ने जांच की, जिसमें तत्कालीन थानाध्यक्ष अतर्रा अरविंद कुमार, सिपाही सुधीर कुमार चौरसिया, महेश्वर प्रसाद, अंकित वर्मा, अरमान अली और अखिलेश कुमार पांडे को दोषी पाया गया। इसके बाद तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल ने सभी आरोपित पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया था।
हालांकि, उस समय दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। अब अदालत के हस्तक्षेप के बाद उनके खिलाफ केस दर्ज करने का रास्ता साफ हुआ है। वहीं, इन पुलिसकर्मियों को सेवा से बर्खास्त करने के लिए अपर पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में विभागीय स्तर पर एसआईटी का गठन भी किया गया है।
मुखबिर को लेकर भी आरोप
पीड़ित का यह भी दावा है कि वर्ष 2021 में उसने बउवा उर्फ रघुनाथ सिंह नामक व्यक्ति को चक्की लगवाने के लिए 2.50 लाख रुपये दिए थे। यह व्यक्ति पुलिस का मुखबिर बताया जाता है, जिसने रुपये वापस नहीं किए। इसके बाद उसे फंसाने की साजिश रची गई।
इस मामले ने एक बार फिर पुलिस तंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत के आदेश के बाद आरोपित पुलिसकर्मियों पर कानून के तहत कितनी सख्त कार्रवाई होती है।