Thursday, January 8

वेनेजुएला संकट से बदला वैश्विक तेल खेल ट्रंप की धमकी से भारत के सामने नई ऊर्जा चुनौती, बदलेगा तेल का गणित?

नई दिल्ली।
अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका के नियंत्रण में वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार आने के बाद वैश्विक ऊर्जा समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। वेनेजुएला के पास लगभग 303 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार है, जो दुनिया के कुल तेल भंडार का करीब 17–18 प्रतिशत माना जाता है। यह मात्रा सऊदी अरब से भी अधिक है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही अपने इरादे स्पष्ट कर चुके हैं कि वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में अब अमेरिकी कंपनियां निर्णायक भूमिका निभाएंगी। इसी बीच ट्रंप ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वह रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखता है तो उस पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अमेरिकी दबाव में रूस से तेल आयात घटाता है, तो इससे देश की ऊर्जा नीति का गणित और कूटनीतिक केमिस्ट्री दोनों बदल सकते हैं।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर तत्काल असर नहीं

हालांकि, सरकारी अधिकारियों और ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा हालात में वेनेजुएला संकट से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर कोई तात्कालिक खतरा नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि हाल के वर्षों में भारत का वेनेजुएला से कच्चे तेल का आयात काफी सीमित रहा है। अमेरिकी कार्रवाई और वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी से भारत के वित्तीय संतुलन पर भी फिलहाल किसी बड़े प्रभाव की आशंका नहीं जताई जा रही है। इसके बावजूद स्थिति पर करीबी नजर रखी जा रही है।

भारत के लिए क्यों अहम है तेल का समीकरण

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक और उपभोक्ता है। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में किसी भी बड़े उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के वित्तीय घाटे, चालू खाते के घाटे और महंगाई पर पड़ता है। अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच भारत ने 17.81 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया, जिसमें रूस सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा। इस दौरान रूस से करीब 6 करोड़ टन तेल आया, जबकि अमेरिका से 1.3 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया गया। इसके अलावा इराक, सऊदी अरब, यूएई, नाइजीरिया और कुवैत भी प्रमुख सप्लायर रहे।

कभी भारत का बड़ा साझेदार था वेनेजुएला

थिंक टैंक जीटीआरआई की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 और 2010 के दशक में भारत वेनेजुएला के प्रमुख तेल खरीदारों में शामिल था। ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) जैसी भारतीय कंपनियों की वेनेजुएला के ओरिनोको बेल्ट में हिस्सेदारी भी थी। हालांकि, 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत-वेनेजुएला व्यापार में भारी गिरावट आई। सेकेंडरी सैंक्शंस के खतरे के चलते भारत को तेल आयात और व्यावसायिक गतिविधियां सीमित करनी पड़ीं।

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का वेनेजुएला से कुल आयात मात्र 36.45 करोड़ डॉलर रहा, जिसमें कच्चे तेल का हिस्सा 25.53 करोड़ डॉलर था। यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 81 प्रतिशत से अधिक की गिरावट को दर्शाता है।

ट्रंप की एंट्री से बदली तस्वीर

विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला में अमेरिकी नियंत्रण से भारत के लिए स्थिति दोधारी तलवार जैसी हो सकती है। एक ओर इससे ओएनजीसी विदेश लिमिटेड का वेनेजुएला में फंसा करीब 1 अरब डॉलर का बकाया वापस मिलने की उम्मीद जगी है। दूसरी ओर, भारत की कई रिफाइनरियां—जैसे रिलायंस और नायरा—वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए अनुकूल हैं, जिससे भविष्य में भारत को सस्ते तेल का विकल्प मिल सकता है।

रूसी तेल पर दबाव सबसे बड़ी चुनौती

सबसे बड़ी चुनौती ट्रंप की वह चेतावनी है, जिसमें रूस से तेल खरीद जारी रखने पर भारत पर भारी टैरिफ लगाने की बात कही गई है। भारत फिलहाल रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है। ऐसे में रूस से दूरी बनाकर केवल अमेरिका पर निर्भर होना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और कूटनीतिक संतुलन के बीच संतुलित रास्ता चुनना होगा।

 

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