Thursday, January 8

महिला की अवैध बेदखली पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, जूनियर जज के खिलाफ जांच की सिफारिश

 

This slideshow requires JavaScript.

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महिला और उसके नाबालिग बच्चों को पैतृक घर से जबरन बेदखल किए जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सिविल जज (जूनियर डिवीजन), बांसी, सिद्धार्थनगर के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच की सिफारिश की है। कोर्ट ने इस पूरे प्रकरण को कानून की प्रक्रिया और राज्य की प्रशासनिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग करार दिया है।

 

न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने न केवल बेदखली की कार्रवाई को अवैध बताया, बल्कि याचिकाकर्ता महिला और उसके नाबालिग बच्चों को मानसिक प्रताड़ना देने के लिए जिला न्यायालय स्थापना में तैनात कोर्ट क्लर्क संदीप गुप्ता पर एक लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया है। साथ ही आदेश दिया गया है कि 48 घंटे के भीतर महिला को विवादित संपत्ति का कब्जा वापस दिलाया जाए।

 

क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता सोनी ने हाई कोर्ट को बताया कि वह सिद्धार्थनगर स्थित अपने पैतृक घर में तीन नाबालिग बच्चों के साथ रहती थीं और वहीं ब्यूटी पार्लर चलाकर परिवार का भरण-पोषण करती थीं। यह संपत्ति मूल रूप से उनके ससुर गेल्हई की थी। उनके निधन के बाद यह संपत्ति उनके वारिसों—याची के पति और अन्य परिजनों—के पास आई, लेकिन संपत्ति का विधिवत बंटवारा नहीं हुआ था।

 

याची का आरोप है कि जिला न्यायालय स्थापना में कार्यरत क्लर्क संदीप गुप्ता ने धोखे से उनके पति और देवर से घर के एक हिस्से का बैनामा अपने पक्ष में करवा लिया। इसके बाद 27 जनवरी 2025 को उसने स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए वाद दायर किया और उसी दिन एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा प्राप्त कर ली।

 

इसके बाद 5 फरवरी 2025 को कथित बेदखली का आरोप लगाते हुए सीपीसी की धारा 151 के तहत आवेदन किया गया। ट्रायल कोर्ट ने उसी दिन पुलिस को निषेधाज्ञा का अनुपालन कराने का आदेश दे दिया।

 

पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल

ट्रायल कोर्ट के आदेश के अनुपालन में राजस्व और पुलिस की संयुक्त टीम गठित की गई। इस टीम ने 18 जुलाई 2025 को याची और उसके नाबालिग बच्चों को घर से बाहर निकाल दिया। हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रशासन ने बिना वैधानिक अधिकार के महिला को बेदखल किया।

 

इन कारणों से हाई कोर्ट नाराज

हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट के आदेश को गंभीर खामियों से भरा बताया। कोर्ट ने कहा कि एकपक्षीय निषेधाज्ञा देते समय सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 नियम-3 का पालन नहीं किया गया। यह भी दर्ज नहीं किया गया कि निषेधाज्ञा के समय या कथित बेदखली के वक्त संपत्ति पर वास्तव में किसका कब्जा था।

 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक निषेधाज्ञा निषेधात्मक होती है, अनिवार्य नहीं। ऐसे आदेश के आधार पर किसी को घर से बेदखल करने का अधिकार प्रशासन को नहीं दिया जा सकता।

 

जांच की सिफारिश

हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यवाही को एकतरफा और अधिकारों के अनावश्यक प्रयोग का उदाहरण बताते हुए आदेश पारित करने वाले सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के लिए मामला मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया है।

 

इस फैसले को न्यायिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

Leave a Reply