
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ चल रही सख्त कार्रवाई और हाल ही में उद्घाटित राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल के बाद अब यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। शिया बहुल देश ईरान के सरकारी टीवी चैनल ‘प्रेस टीवी’ ने लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों की स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं, जिस पर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है।
ईरानी टीवी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नवाबी दौर की शान, इंडो-पर्शियन स्थापत्य और इस्लामी विरासत के लिए विश्वभर में पहचानी जाने वाली लखनऊ नगरी आज “खामोश संकट” से गुजर रही है। रिपोर्ट में वर्षों की उपेक्षा, बेतरतीब शहरी विस्तार और अवैध निर्माण को शहर की पहचान के लिए खतरा बताया गया है।
मुगलकालीन धरोहरों पर सवाल
प्रेस टीवी की रिपोर्ट में इमामबाड़ा, मस्जिदों, दरवाजों और अन्य ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण को लेकर चिंता जताई गई है। दावा किया गया है कि कई स्मारकों की दीवारें दरक रही हैं, छतें क्षतिग्रस्त हैं और उनके आसपास तेजी से अतिक्रमण बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यह वही इमारतें हैं जो न सिर्फ नवाबी दौर की कहानी कहती हैं, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी गहराई से जुड़ी रही हैं।
ईरान की दिलचस्पी क्यों?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लखनऊ में शिया समुदाय की बड़ी आबादी और शहर की ऐतिहासिक इंडो-पर्शियन विरासत के कारण ईरान इस मुद्दे को उछाल रहा है। ईरान एक शिया राष्ट्र है और प्रेस टीवी उसका पहला 24 घंटे चलने वाला अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल है, जो 2007 से अंग्रेजी में प्रसारण करता है। ऐसे में लखनऊ की स्थिति को लेकर ईरानी मीडिया की सक्रियता को सामान्य चिंता से आगे राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
एएसआई पर उठे सवाल
रिपोर्ट में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। विशेषज्ञों और विरासत प्रेमियों का कहना है कि जिन ऐतिहासिक इमारतों की जिम्मेदारी एएसआई के पास है, वे भी उपेक्षा का शिकार हैं। कमजोर निगरानी, अवैध निर्माण और संरक्षण कानूनों के ढीले क्रियान्वयन से सदियों पुरानी धरोहरें असुरक्षित होती जा रही हैं।
स्थानीय नेताओं ने भी जताई चिंता
धार्मिक और राजनीतिक नेता यासूब अब्बास ने कहा कि यदि स्मारकों से होने वाली आय का मात्र 25 प्रतिशत भी उनके रखरखाव पर खर्च किया जाए, तो उनकी खोई हुई रौनक लौट सकती है। पूर्व अधिकारी सैयद अशरफ रज़ा ज़ैसी ने अदालतों के आदेशों के बावजूद अतिक्रमण न हटने पर नाराजगी जताई। वहीं, मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव कल्बे जव्वाद नकवी ने सरकार पर संरक्षण को लेकर गंभीरता न दिखाने का आरोप लगाया।
सरकार का दावा: कार्रवाई जारी
दूसरी ओर, योगी आदित्यनाथ सरकार का दावा है कि लखनऊ में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। नगर निगम, एलडीए और प्रशासन बुलडोजर एक्शन के जरिए सरकारी जमीन को कब्जा-मुक्त करा रहे हैं। सरकार का कहना है कि यह अभियान किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि कानून के तहत शहर को व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के लिए है।
टास्क फोर्स की मांग
विरासत विशेषज्ञों ने लखनऊ की स्थापत्य धरोहर को बचाने के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित करने, जनजागरूकता बढ़ाने और शहरी नियोजन को जिम्मेदार बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो नवाबों के शहर की ऐतिहासिक आत्मा ही खतरे में पड़ जाएगी।
लखनऊ, जो कभी इस्लामी कला, संस्कृति और तहजीब का वैश्विक प्रतीक था, आज संरक्षण बनाम विकास की जंग के बीच खड़ा है। सवाल यह है कि क्या यह शहर अपनी ऐतिहासिक पहचान को बचा पाएगा, या फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठती चिंताएं महज राजनीतिक शोर बनकर रह जाएंगी।