
चंडीगढ़। पंजाब की एक निजी यूनिवर्सिटी में दीवार गिरने से स्थायी रूप से विकलांग हुई पूर्व छात्रा को आखिरकार 12 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिला है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए यूनिवर्सिटी को 1.37 करोड़ रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हर छात्र को सुरक्षित माहौल में बिना किसी शारीरिक खतरे के शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 21ए के तहत जीवन और शिक्षा के अधिकार का अहम हिस्सा है।
हाईकोर्ट ने देश भगत यूनिवर्सिटी, मंडी गोबिंदगढ़ और यूनिवर्सिटी संचालित करने वाली संस्था आसरा फाउंडेशन को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए मुआवजा देने का निर्देश जारी किया।
फाइनल ईयर की छात्रा पर गिर गई थी टॉयलेट की दीवार
यह दर्दनाक घटना 11 अक्टूबर 2013 की है। उस समय छात्रा संदीप कौर की उम्र 23 वर्ष थी और वह यूनिवर्सिटी में बीएससी फाइनल ईयर की छात्रा थीं।
जानकारी के अनुसार, संदीप कौर अपने एक दोस्त के साथ यूनिवर्सिटी कैंपस स्थित टॉयलेट गई थीं। दोस्त एक क्यूबिकल के अंदर थी, जबकि संदीप बाहर गेटकीपर की कुर्सी पर बैठी थीं। इसी दौरान अचानक तेज तूफान आया और टॉयलेट की दीवार गिर गई, जिससे संदीप मलबे में दब गईं।
इस हादसे में उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई और वह 100 प्रतिशत स्थायी रूप से विकलांग हो गईं।
इलाज के दौरान कई अस्पतालों में किया गया रेफर
घटना के बाद संदीप कौर को यूनिवर्सिटी बस से पहले मंडी गोबिंदगढ़ सिविल अस्पताल ले जाया गया। बाद में उन्हें गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, सेक्टर-32 चंडीगढ़ रेफर किया गया। इसके बाद उन्हें अल्केमिस्ट हॉस्पिटल, सेक्टर-21 पंचकूला शिफ्ट किया गया, जहां उनका इलाज चला।
यूनिवर्सिटी ने वादा किया, लेकिन मदद अधूरी छोड़ दी
छात्रा की ओर से दाखिल याचिका के अनुसार, यूनिवर्सिटी अधिकारियों ने इलाज का पूरा खर्च उठाने का वादा किया था। लेकिन 18 अक्टूबर तक केवल 2.25 लाख रुपये जमा किए गए और इसके बाद इलाज व अन्य खर्चों के लिए कोई सहायता नहीं दी गई।
इलाज के बाद जब यह स्पष्ट हुआ कि छात्रा स्थायी रूप से विकलांग हो चुकी है, तब पीड़िता ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
यूनिवर्सिटी ने जिम्मेदारी से किया इनकार
मामले में यूनिवर्सिटी ने अदालत में दावा किया कि उसने अंतिम समाधान के तौर पर छात्रा को 5 लाख रुपये देने का प्रस्ताव दिया था। साथ ही यह भी कहा कि दीवार गिरने के पीछे यूनिवर्सिटी की लापरवाही नहीं थी, इसलिए मुआवजा देने की जिम्मेदारी उन पर नहीं बनती।
हालांकि हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी की दलील को खारिज करते हुए कहा कि टॉयलेट यूनिवर्सिटी परिसर में स्थित था और वह यूनिवर्सिटी की संपत्ति थी, इसलिए उसकी देखरेख और रख-रखाव की जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी प्रशासन की ही थी।
कोर्ट ने माना- छात्रा का भविष्य बर्बाद हुआ
हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि तय करते हुए कहा कि संदीप कौर एक होनहार छात्रा थीं और यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद उनके सामने करियर और जीवन में आगे बढ़ने के कई अवसर थे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि एक युवा लड़की के स्वाभाविक सपने—जैसे विवाह, परिवार और मातृत्व—पर इस हादसे का गंभीर असर पड़ा, जिससे उसका पूरा जीवन बदल गया।
7.5% ब्याज सहित तीन महीने में भुगतान का आदेश
हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी और संबंधित संस्था को निर्देश दिया कि पीड़िता को 1.37 करोड़ रुपये मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
अदालत ने मुआवजा राशि देने के लिए संबंधित पक्षों को तीन महीने का समय दिया है।
फैसले का महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला निजी शिक्षण संस्थानों के लिए एक सख्त संदेश है कि वे छात्रों की सुरक्षा को हल्के में नहीं ले सकते। संस्थान परिसर में होने वाली किसी भी दुर्घटना के लिए प्रशासन की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
