
आजमगढ़: उत्तर प्रदेश के मुबारकपुर में 30 अप्रैल 1999 को भड़के शिया-सुन्नी दंगे के 27 साल बाद आजमगढ़ कोर्ट ने फैसला सुनाया। अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी करार दिया है। दोषियों को सजा सुनाने की तारीख 17 फरवरी 2026 निर्धारित की गई है।
30 अप्रैल 1999 को क्या हुआ था?
मुबारकपुर कस्बे में मोहर्रम के जुलूस के दौरान शिया और सुन्नी समुदाय के बीच तनाव बढ़ा। पूराख्वाजा निवासी अली अकबर की पिटाई कर हत्या कर दी गई। 30 अप्रैल को उनकी सिरकटी लाश राजा भाट के पोखरे से बरामद हुई। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच हिंसा भड़क उठी।
हिंसा का सिलसिला
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30 अप्रैल 1999 से शुरू हुए दंगे लगभग 19 महीने तक चले।
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इस दौरान तीन बार क्षेत्र में हिंसा भड़की।
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इन दंगों में 17 लोगों की मौत और दर्जनों लोग घायल हुए।
मुबारकपुर में मोहर्रम की नौवीं की रात जुलूस निकाला जा रहा था। शिया समुदाय ने इमामबाड़ा के पास महिलाएँ बैठाने के लिए पर्दा लगाया था। दसवीं के दिन सुबह आग लगने की घटना से दोनों पक्षों में विवाद और बढ़ गया।
जनवरी 2000 और नवंबर 2000 की घटनाएँ
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25 जनवरी 2000: सुन्नी समुदाय के तीन लोगों की हत्या, कर्फ्यू लागू।
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नवंबर 2000: मुबारकपुर कस्बे में सीरियल ब्लास्ट, 13 लोगों की मौत, पूरे इलाके में माहौल तनावपूर्ण।
कोर्ट का फैसला
आजमगढ़ कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी कर 12 आरोपियों को दोषी करार दिया। दोषियों में शामिल हैं:
हुसैन अहमद, मोहम्मद असहद, अफजल, अलाउद्दीन, दिलशाद, वसीम, मोहम्मद अयूब फैजी, फहीम अख्तर, असरार अहमद, मोहम्मद याकूब, अली जहीर और इरशाद।
मामले में कुल 16 आरोपी थे, लेकिन सुनवाई के दौरान चार की मौत हो गई थी।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका
अभियोजन पक्ष ने नौ गवाहों को कोर्ट में पेश किया। पुलिस जांच में पता चला कि हत्या मोहर्रम जुलूस के दौरान हुई और इसे सुन्नी समुदाय के लोगों ने अंजाम दिया। अदालत ने सभी सबूतों और गवाहों की दलीलों के आधार पर दोषियों को करार दिया।
निष्कर्ष
मुबारकपुर दंगा मामले में 27 साल बाद आया यह फैसला न्याय की प्रतीक है। लंबे समय तक चली सुनवाई और जांच के बाद अदालत ने दोषियों के विरुद्ध सख्त कदम उठाया है।
