
नई दिल्ली: भारत की नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-प्राइम (Agni-P) ने दक्षिण एशिया के सामरिक समीकरणों में नई हलचल पैदा कर दी है। 24 दिसंबर 2025 को ओडिशा के इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से किए गए सफल परीक्षण ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब रेल-आधारित मोबाइल मिसाइल क्षमता को और अधिक आधुनिक बना रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रणाली दुश्मन की निगरानी व्यवस्था के लिए “घोस्ट ट्रेन” जैसी है — मौजूद, लेकिन पकड़ से बाहर।
अमेरिकी थिंक टैंक IISS की रिपोर्ट के मुताबिक, रेल-माउंटेड मिसाइल प्लेटफॉर्म स्वभाविक रूप से अत्यधिक मोबाइल होते हैं। भारत का विशाल रेल नेटवर्क इस क्षमता को और खतरनाक बनाता है, क्योंकि हजारों ट्रेनों के बीच मिसाइल प्लेटफॉर्म को ट्रैक करना लगभग असंभव हो जाता है।
रणनीतिक लोकेशन से बढ़ी मारक क्षमता
रिपोर्टों के अनुसार, भारत के संभावित रेल-आधारित मिसाइल स्टोरेज और तैनाती केंद्र महाराष्ट्र के देहू और असम के मिस्सा जैसे रणनीतिक स्थानों से जुड़े हो सकते हैं। देहू की लोकेशन पाकिस्तान सीमा के बेहद करीब मानी जाती है, जबकि पूर्वोत्तर भारत की स्थिति चीन की दिशा में सामरिक बढ़त देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की तैनाती भारत को दो मोर्चों पर त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता देती है।अग्नि-प्राइम क्यों है खास
अग्नि-प्राइम सॉलिड-फ्यूल आधारित मिसाइल है, जिसे पहले से तैयार लॉन्च कैनिस्टर में रखा जा सकता है। इसे मौके पर ईंधन भरने की जरूरत नहीं होती, जिससे यह बेहद कम समय में लॉन्च के लिए तैयार हो जाती है। इसकी उच्च गति और मोबाइल तैनाती इसे नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल बनाती है।
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे.एस. सोढ़ी के अनुसार, “भविष्य की संभावित बहु-मोर्चीय चुनौतियों को देखते हुए भारत को ऐसी मिसाइल क्षमता की जरूरत है, जो त्वरित, लचीली और निर्णायक जवाब देने में सक्षम हो।”
दुनिया में रेल-मोबाइल मिसाइल की होड़
रेल-आधारित मिसाइल प्रणाली नई अवधारणा नहीं है। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ ने इस तकनीक पर काम किया था। रूस ने कुछ समय तक इसे तैनात भी किया, लेकिन लागत और हथियार नियंत्रण संधियों के चलते कार्यक्रम बंद करना पड़ा। चीन और उत्तर कोरिया भी इस दिशा में प्रयोग कर चुके हैं, हालांकि भारत अब इस क्षमता को व्यावहारिक स्तर पर मजबूत करने वाले देशों की अग्रिम पंक्ति में माना जा रहा है।
रणनीतिक संतुलन का नया अध्याय
विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल परमाणु प्लेटफॉर्म किसी भी देश की “सेकंड स्ट्राइक क्षमता” को मजबूत करते हैं — यानी पहले हमले के बाद भी जवाब देने की क्षमता। हालांकि इससे वैश्विक हथियार नियंत्रण के प्रयास जटिल हो जाते हैं, क्योंकि ऐसी मोबाइल प्रणालियों की निगरानी बेहद कठिन होती है।
भारत की अग्नि-प्राइम क्षमता को रक्षा विश्लेषक एक स्पष्ट संदेश के रूप में देख रहे हैं: बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भारत अपनी प्रतिरोधक क्षमता को तकनीकी रूप से लगातार उन्नत कर रहा है।