
नई दिल्ली/मॉस्को।
भारत और रूस मिलकर ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को हाइपरसोनिक तकनीक से लैस करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। यदि यह परियोजना सफल होती है तो यह एशिया की सामरिक शक्ति–संतुलन में बड़ा बदलाव ला सकती है। ब्रह्मोस-2 नाम से विकसित हो रही यह मिसाइल चीन के लिए आने वाले कई वर्षों तक एक ऐसी चुनौती होगी, जिसका प्रभावी जवाब ढूंढना आसान नहीं होगा।
रूस की अग्रणी मिसाइल निर्माता कंपनी NPO माशिनोस्ट्रोयेनिया के डायरेक्टर जनरल और चीफ डिज़ाइनर अलेक्जेंडर लियोनोव ने पुष्टि की है कि भारत और रूस ब्रह्मोस मिसाइल की स्पीड और क्षमताओं को बढ़ाने के लिए संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा सुपरसोनिक ब्रह्मोस को हाइपरसोनिक श्रेणी में ले जाने के लिए तकनीकी आधुनिकीकरण जारी है।
मैक-5 से मैक-7 की रफ्तार, इंटरसेप्शन लगभग नामुमकिन
ब्रह्मोस-2 को एक नेक्स्ट–जेनरेशन हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसकी अनुमानित गति मैक-5 से मैक-7 के बीच हो सकती है। मौजूदा ब्रह्मोस पहले ही मैक-2.8 से अधिक की रफ्तार से उड़ान भरती है और इसे इंटरसेप्ट करना आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम के लिए भी बेहद कठिन माना जाता है।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व निदेशक और DRDO के वरिष्ठ वैज्ञानिक अतुल दिनकर राणे के अनुसार, मौजूदा ब्रह्मोस को भी अगले 5–7 वर्षों तक दुनिया का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह रोकने में सक्षम नहीं है। ऐसे में हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-2 इस बढ़त को कई गुना बढ़ा देगी।
स्क्रैमजेट इंजन और अत्याधुनिक तकनीक
रिपोर्ट्स के मुताबिक ब्रह्मोस-2 में स्क्रैमजेट इंजन का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो हाइपरसोनिक गति पर लगातार उड़ान बनाए रखने में सक्षम होता है। इस कार्यक्रम में हाई–टेम्परेचर मटीरियल, एडवांस्ड एयरोडायनामिक्स, अत्याधुनिक गाइडेंस सिस्टम और नई पीढ़ी की प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी शामिल हैं।
इस जॉइंट वेंचर का लक्ष्य लगभग 1500 किलोमीटर तक मार करने वाली हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल विकसित करना है।
चीन के पश्चिमी थिएटर कमांड पर सीधा असर
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रह्मोस-2 सफल होती है तो यह चीन के पश्चिमी थिएटर कमांड और रॉकेट फोर्स की रणनीति को गंभीर चुनौती देगी। तिब्बत और पश्चिमी चीन में मौजूद कई अहम सैन्य ठिकाने इसकी रेंज और गति के दायरे में आ सकते हैं।
चीन भले ही भविष्य में ब्रह्मोस को रोकने वाली एयर डिफेंस क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-2 उसके लिए आने वाले वर्षों तक एक लगभग अजेय हथियार साबित हो सकती है।
2031 तक सेनाओं में शामिल होने की संभावना
सूत्रों के अनुसार, यदि विकास कार्यक्रम तय समय पर आगे बढ़ता है तो 2031 तक भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना में ब्रह्मोस-2 के इंटीग्रेशन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
भारत–रूस की यह साझेदारी न सिर्फ तकनीकी दृष्टि से अहम है, बल्कि यह भारत की सामरिक ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाला कदम भी मानी जा रही है।