Wednesday, January 28

पिता की डायरी पढ़कर टूट गए थे संजय मिश्रा फिल्में छोड़ ऋषिकेश भागे, ढाबे पर धोए बर्तन

मुंबई। फिल्म ‘वध 2’ को लेकर चर्चा में बने अभिनेता संजय मिश्रा ने हाल ही में अपने जीवन के सबसे कठिन दौर का खुलासा किया है। एक इंटरव्यू में संजय मिश्रा ने बताया कि पिता की मौत के बाद जब उन्होंने उनकी लिखी डायरी पढ़ी, तो उन्हें गहरा सदमा लगा। डायरी में यह लिखा था कि बेटे के व्यवहार के कारण पिता को शर्मिंदगी महसूस हुई थी। यह जानकर संजय अंदर से पूरी तरह टूट गए और उन्होंने कुछ समय के लिए फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली।

This slideshow requires JavaScript.

 

संजय मिश्रा के अनुसार, यह वह समय था जब उनके पिता का निधन हो चुका था और खुद अभिनेता भी एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। एक सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने यहां तक कह दिया था कि ऑपरेशन असफल होने पर वह एक-दो दिन से ज्यादा नहीं बच पाएंगे। इसी मानसिक और शारीरिक पीड़ा के बीच संजय मुंबई छोड़कर ऋषिकेश चले गए।

 

ढाबे पर करने लगे काम

 

संजय मिश्रा ने बताया कि ऋषिकेश में वह एक साधारण जीवन जीने लगे और एक ढाबे पर बर्तन धोने का काम करने लगे। उन्होंने कहा, “मेरी तबीयत ठीक नहीं थी, दिमाग काम नहीं कर रहा था और पिता की मौत का सदमा अलग था। ऐसे में मैं सबकुछ छोड़कर वहां चला गया।”

 

फिल्म दिखाने ले गए पिता, वहीं हुआ विवाद

 

संजय मिश्रा ने उस घटना का भी जिक्र किया, जिसने उन्हें जीवनभर के लिए कचोट दिया। उन्होंने बताया कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद पिता उन्हें अपनी फिल्म ‘आलू चाट’ दिखाने थिएटर ले गए थे। फिल्म के दौरान जब लोग संजय के साथ फोटो खिंचवाने लगे, तो उन्होंने गुस्से में दर्शकों पर चिल्ला दिया और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया।

 

संजय के मुताबिक, पिता ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन उस समय उन्होंने अपने पिता पर ही चिल्ला दिया। बाद में पिता की डायरी में इसी घटना का उल्लेख था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि बेटे के व्यवहार से उन्हें शर्मिंदगी महसूस हुई।

 

डायरी पढ़कर टूट गए

 

संजय मिश्रा ने कहा, “पिता की मौत के बाद जब मैंने उनकी डायरी पढ़ी, तो लिखा था कि मैंने उन्हें शर्मिंदा किया। उस पल मैं चाहता था कि वह एक बार आंखें खोल दें, ताकि मैं उनसे माफी मांग सकूं और कह सकूं कि मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था।”

 

आध्यात्म की ओर झुकाव

 

पिता की मौत के बाद संजय मिश्रा पूरी तरह टूट गए और आध्यात्म की ओर मुड़ गए। वह हरिद्वार और ऋषिकेश चले गए। अभिनेता ने कहा कि उन्हें लगा, “जब सबको मरना ही है, तो इतनी भागदौड़ क्यों?” इसी सोच के साथ उन्होंने कुछ समय खुद से दूरी बनाई और अकेले रहने लगे।

 

संघर्ष से सफलता तक

 

गौरतलब है कि संजय मिश्रा आज हिंदी सिनेमा के सबसे मजबूत और भरोसेमंद अभिनेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने 1995 में फिल्म ‘ओह डार्लिंग! ये है इंडिया’ से करियर की शुरुआत की थी। ‘सत्या’, ‘दिल से’, ‘बंटी और बबली’, ‘गोलमाल’, ‘ऑल द बेस्ट’, ‘फंस गए रे ओबामा’, ‘आंखों देखी’ और ‘वध’ जैसी फिल्मों में उनकी भूमिकाएं दर्शकों को आज भी याद हैं। संजय मिश्रा दो बार फिल्मफेयर क्रिटिक्स चॉइस अवॉर्ड भी जीत चुके हैं।

 

संघर्ष, आत्मग्लानि और आत्मबोध से गुजरकर संजय मिश्रा आज एक बार फिर पूरी मजबूती के साथ पर्दे पर लौटे हैं और ‘वध 2’ में उनके अभिनय को लेकर दर्शकों में खास उत्साह है।

 

Leave a Reply