
कानपुर (सुमित शर्मा) – प्रयागराज में माघ मेले के दौरान शंकराचार्य विवाद को लेकर अपने पद से इस्तीफा देने वाले पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का नाम अब चर्चा में है। लेकिन अब सामने आई है उनकी परिवारिक परंपरा और मूल्यों की कहानी, जिसमें आत्मसम्मान को कभी समझौता नहीं किया गया।
अलंकार अग्निहोत्री की मां गीता अग्निहोत्री बैंक ऑफ बदौड़ा में कैशियर के पद पर 21 साल तक कार्यरत रहीं। उनके छोटे बेटे विजय के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियों को संभालते हुए उन्होंने नौकरी की। लेकिन जब बैंक में एक मैनेजर ने उन्हें काम न करने का आरोप लगाकर परेशान किया, तो उन्होंने अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
उनके उसी आत्मसम्मान और मूल्य को देखकर अब अलंकार ने भी अपने पद से इस्तीफा देने का ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए कानून और माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ पुलिस-प्रशासन के अनुचित व्यवहार ने उन्हें दुखी किया, इसलिए यह निर्णय लिया गया।
शिक्षा और करियर में उत्कृष्टता
अलंकार अग्निहोत्री ने आईआईटी बीएचयू से बीटेक करने के बाद बेंगलुरु, नार्वे और अमेरिका में नौकरी की। 2017 में अमेरिका से लौटकर उन्होंने परिवार से चर्चा की और पीसीएस की तैयारी शुरू की। 2019 में पहले ही प्रयास में पांचवीं रैंक हासिल कर उन्होंने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग परीक्षा पास की। नियुक्ति के 6 साल बाद नौकरी छोड़ने के उनके निर्णय से परिवार को गहरा धक्का लगा, लेकिन परिवार ने एकजुट होकर उनका समर्थन किया।
अलंकार के ताऊ एसके सिंह ने बताया कि अलंकार का स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं था, लेकिन जिस तरह उनका व्यवहार किया गया, उससे वे आहत थे। चचेरे भाई राजेश ने कहा कि अलंकार का फैसला पूरी सोच-विचार के बाद लिया गया और परिवार उनके साथ खड़ा है।
यह घटना परिवार के सिद्धांत और आत्मसम्मान की मिसाल के रूप में देखी जा रही है, जहां पिता के निधन के बाद मां और बेटे ने सच्चाई और सम्मान को सर्वोपरि रखा।