Tuesday, January 27

माघ मेले में कल्पवास के बाद शैय्या दान का विशेष महत्व, पापों से मुक्ति के लिए श्रद्धालु कर रहे महादान

प्रयागराज। संगम तट पर चल रहे माघ मेले में कल्पवास करने वाले श्रद्धालु अब शैय्या दान के माध्यम से अपने व्रत की पूर्णता कर रहे हैं। शास्त्रों में इसे ‘पश्चाताप का दान’ कहा गया है, जिसका उद्देश्य पापों का नाश और आत्मिक शुद्धि माना जाता है। कल्पवास के समापन पर किया जाने वाला यह दान मोक्ष की ओर ले जाने वाला मार्ग बताया गया है।

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शैय्या दान के अंतर्गत श्रद्धालु अपने दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं—जैसे पलंग, गद्दा, बिस्तर, बर्तन, वस्त्र सहित अन्य आवश्यक सामग्री—दान स्वरूप प्रदान करते हैं। मान्यता है कि बिना शैय्या दान के कल्पवास अधूरा माना जाता है।

दंडी स्वामी महेशाश्रम महाराज ने आईएएनएस से बातचीत में बताया कि पूर्व काल में लोग 3, 5 और 12 वर्षों तक कल्पवास करते थे, लेकिन वर्तमान समय में स्वास्थ्य कारणों से अवधि कम हो गई है। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु 12 वर्षों का कल्पवास पूर्ण करता है, उसे अनिवार्य रूप से शैय्या दान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार 12 वर्ष का कल्पवास करने से जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।

वहीं, तीर्थ पुरोहित विनय मिश्रा ने बताया कि शैय्या दान का अधिकार हर ब्राह्मण को नहीं होता। यह दान केवल कुल के पुरोहित द्वारा ही ग्रहण किया जाता है, क्योंकि इसे पापों के हस्तांतरण का दान माना गया है। उन्होंने कहा कि माघ मेले में हर वर्ष हजारों श्रद्धालु कल्पवास के बाद शैय्या दान कर अपनी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण करते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, कल्पवास के दौरान श्रद्धालु संगम तट पर निवास कर देवताओं का पूजन, ध्यान और संयमित जीवन का पालन करते हैं। पौष माह की एकादशी से लेकर माघ माह की द्वादशी तक शैय्या दान का विशेष महत्व बताया गया है। कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक दिन से लेकर तीन दिन, तीन महीने, छह महीने, दो वर्ष, तीन वर्ष और बारह वर्ष तक निर्धारित की गई है।

माघ मेले में आस्था, तप और दान का यह अनूठा संगम श्रद्धालुओं के लिए न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष की साधना का माध्यम भी माना जाता है।

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