
बिहार की राजनीति में विकास और काम से ज्यादा जातीय और सामाजिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। इस सियासी सच का सामना राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे और पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव को करना पड़ा। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में महुआ सीट से करारी हार ने यह साफ कर दिया कि केवल नाम, काम और विरासत के सहारे चुनाव जीतना संभव नहीं है।
लालू यादव द्वारा पार्टी से छह साल के लिए निष्कासन के बाद तेज प्रताप यादव ने अलग राजनीतिक राह चुनी, नई पार्टी बनाई और चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए। इसका सबसे बड़ा कारण उनका सामाजिक और जातीय आधार से कट जाना माना जा रहा है।
2015 में MY समीकरण बना ताकत, 2025 में वही रहा दूर
वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में तेज प्रताप यादव राजद उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे। उस समय MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण ने उनकी जीत की मजबूत नींव रखी थी। लेकिन 2025 के चुनाव में पिता लालू यादव से राजनीतिक और पारिवारिक दूरी ने इस समीकरण को तोड़ दिया।
स्थिति यह बनी कि महुआ सीट पर दो यादव उम्मीदवार मैदान में थे। वोटों का बंटवारा हुआ और इसका सीधा फायदा लोजपा (रामविलास) के उम्मीदवार संजय सिंह को मिला। दिलचस्प तथ्य यह रहा कि राजद उम्मीदवार मुकेश रोशन और तेज प्रताप यादव को मिले वोटों का कुल जोड़ भी संजय सिंह से कम रहा।
महुआ छोड़ने की कीमत चुकानी पड़ी
राजनीतिक जानकारों के अनुसार तेज प्रताप यादव की हार की कहानी 2020 के विधानसभा चुनाव से ही लिखी जा चुकी थी। उस चुनाव में महुआ से विधायक रहते हुए उन्होंने सीट छोड़कर हसनपुर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस कदम को महुआ की जनता ने विश्वासघात के रूप में देखा।
हालांकि तेज प्रताप यादव के प्रयासों से महुआ को मेडिकल कॉलेज जैसी बड़ी सौगात मिली और कुछ अन्य विकास कार्य भी हुए, लेकिन सीट बदलने के फैसले ने उनकी साख को गहरा नुकसान पहुंचाया। जनता के बीच यह धारणा बनी कि जो नेता जीत के बाद क्षेत्र छोड़ सकता है, वह हार के बाद दिखाई भी नहीं देगा।
2025 के चुनाव में तेज प्रताप यादव ने मेडिकल कॉलेज के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज का वादा भी किया, लेकिन तब तक जनता का भरोसा लौटना मुश्किल हो चुका था।
काम काफी नहीं, समीकरण जरूरी
वरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क का कहना है कि बिहार की राजनीति में केवल काम के आधार पर जीत तय नहीं होती। तात्कालिक लाभ और सामाजिक समीकरण अक्सर निर्णायक साबित होते हैं।
वे कहते हैं कि तेजस्वी यादव की महिलाओं को 2500 रुपये की घोषणा के जवाब में नीतीश कुमार द्वारा 10 हजार रुपये की सहायता योजना ने चुनावी समीकरण बदल दिए। इसी तरह राष्ट्रीय राजनीति में भी काम और परिणामों के बीच सीधा संबंध हमेशा नहीं दिखता।
यादव राजनीति से कटे तेज प्रताप
वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडे के अनुसार, बिहार में चुनाव जीतने के लिए जातीय आवरण में सामाजिक संतुलन बेहद जरूरी है। तेज प्रताप यादव ऐसा कोई मजबूत समीकरण खड़ा नहीं कर सके।
राजद से अलग होने के बाद वे यादव समुदाय के सर्वमान्य नेता भी नहीं बन पाए, जिससे उनकी राजनीतिक जमीन और कमजोर होती चली गई।
विरासत काफी नहीं
तेज प्रताप यादव की हार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार की राजनीति में विरासत, व्यक्तिगत पहचान और विकास कार्य तभी कारगर होते हैं, जब वे मजबूत सामाजिक और जातीय समीकरणों से जुड़े हों। महुआ की हार तेज प्रताप यादव के लिए केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति का एक बड़ा सबक बनकर सामने आई है।