
अफगानिस्तान में अब पाकिस्तानी दवाओं की जगह भारतीय फार्मा कंपनियों का दबदबा बढ़ा; जीवन रक्षक आपूर्ति और MoU से मजबूत हुआ भारत का प्रभावनई दिल्ली: भारत ने अफगानिस्तान में फार्मा सेक्टर के जरिए पाकिस्तान को एक बड़ा झटका दिया है। अफगानिस्तान में पहले पाकिस्तानी दवाओं का दबदबा था, लेकिन अब भारतीय दवाइयां तेजी से वहां के बाजार में अपनी जगह बना रही हैं। यह बदलाव हाल के राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रमों का नतीजा है।
अफगानी ब्लॉगर फजल अफगान के मुताबिक, भारतीय दवाएं पाकिस्तानी या तुर्की दवाओं के मुकाबले करीब चार गुना सस्ती हैं और प्रभावी परिणाम देती हैं। यही कारण है कि अफगानिस्तान में लोग अब तेजी से भारतीय दवाओं की ओर बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अफगानिस्तान में पाकिस्तान की फार्मास्यूटिकल हिस्सेदारी 2024 से घट रही थी। अक्टूबर-नवंबर 2025 में हुई सीमा पर झड़पों के बाद अफगानिस्तान के उप-प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर ने पाकिस्तान से आने वाली दवाओं पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद भारत ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में काबुल को 108 मिलियन डॉलर की दवाइयां भेजीं और 2025 में 100 मिलियन डॉलर की आपूर्ति की।
भारत की इस मदद ने अफगानिस्तान में संकट की घड़ी में राहत दी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नवंबर 2025 में 73 टन जीवन रक्षक चिकित्सा सामग्री हवाई मार्ग से काबुल भेजी। इससे पहले भी भारत ने टीके, एम्बुलेंस, CT-स्कैनर और आपातकालीन मेडिकल सप्लाई भेजी थी।
इसके साथ ही, भारतीय फार्मा दिग्गज जाइडस लाइफसाइंसेज ने दुबई में अफगानिस्तान के रोफिस इंटरनेशनल ग्रुप के साथ 100 मिलियन डॉलर का MoU किया। यह समझौता स्थानीय विनिर्माण और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देगा, जिससे अफगानिस्तान की आयात निर्भरता कम होगी।
फार्मा सेक्टर में इस कदम ने भारत की कूटनीतिक और आर्थिक ताकत को भी बढ़ाया है। पाकिस्तान की दशकों पुरानी प्रभावशीलता अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जबकि भारत अफगानिस्तान में स्थायी और भरोसेमंद भागीदार के रूप में उभर रहा है।