
नई दिल्ली: ईरान में दिसंबर से शुरू हुए व्यापक विरोध प्रदर्शन अब खुले तौर पर सत्ता परिवर्तन की मांग करने लगे हैं। महंगाई, आर्थिक बदहाली और रियाल की गिरावट के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन में अब छात्र, महिलाएं और युवा भी शामिल हो गए हैं। इंटरनेट और फोन सेवाओं पर पाबंदी के बावजूद स्टारलिंक जैसी सेवाओं ने प्रदर्शनकारियों को जोड़ रखा है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार अब तक 2,000 से अधिक मौतें हो चुकी हैं, और यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे बड़ा विद्रोह माना जा रहा है।
वैश्विक और क्षेत्रीय असर:
ईरान संकट का असर न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। तेल उत्पादन बाधित होने, होर्मुज जलडमरूमध्य के अवरुद्ध होने और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उछाल की संभावना से ऊर्जा बाजार प्रभावित होगा। इसके साथ ही ईरान के प्रॉक्सी संगठन हिजबुल्लाह और हमास कमजोर पड़ सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी। रूस और चीन समर्थन दे सकते हैं, लेकिन यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस की भूमिका सीमित होगी।
भारत पर असर:
ईरान भारत का रणनीतिक और आर्थिक साझेदार रहा है। चाबहार बंदरगाह और चाबहार-जाहेदान रेल लाइन जैसे परियोजनाएं भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ती हैं। लेकिन विद्रोह और हड़तालें सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही हैं। भारत का निर्यात, विशेषकर बासमती चावल, मसाले और ड्राई फ्रूट्स, संकट की चपेट में है। तेल की कीमतों में वृद्धि और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता से भारत में महंगाई बढ़ने की संभावना है।
सुरक्षा और कूटनीति:
ईरान में करीब 5 लाख भारतीय छात्र और कारोबारी जोखिम में हैं। विदेश मंत्रालय ने अपने ताजा निर्देश में उन्हें सुरक्षित निकासी की सलाह दी है। भारत को अब SCO और BRICS जैसे मंचों पर मध्यस्थता की भूमिका निभानी होगी और चाबहार परियोजना को बचाने के लिए वैकल्पिक फंडिंग और रूट तलाशने होंगे।
विश्लेषक राय:
विश्लेषकों के अनुसार, अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ और नया शासन भारत के अनुकूल बना, तो यह दीर्घकालीन अवसर भी पैदा कर सकता है। फिलहाल, भारत के लिए सतर्कता और रणनीतिक संतुलन सबसे बड़ा हथियार है।
