उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर विवाद से जुड़े सर्वे के दौरान भड़की हिंसा ने जिले को हिला कर रख दिया था। इस मामले में अब एक बड़ा कानूनी मोड़ आया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर ने मंगलवार को तत्कालीन क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाल अनुज तोमर सहित 15 से 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं।
यह आदेश खग्गू सराय निवासी युवक आलम के पिता यामीन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया गया है। अदालत ने पुलिस को सात दिनों के भीतर केस दर्ज कर जांच शुरू करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
24 नवंबर 2024: हिंसा कैसे भड़की?
24 नवंबर 2024 की सुबह शाही जामा मस्जिद परिसर में सर्वे के लिए एक टीम पहुंची थी। पहले भी यहां सर्वे हो चुका था, लेकिन जैसे ही दोबारा सर्वे की सूचना फैली, माहौल तनावपूर्ण हो गया। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौके पर जुट गए और सर्वे का विरोध शुरू हो गया।
देखते ही देखते प्रदर्शन उग्र हो गया और पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू हो गई। आरोप है कि आसपास के मकानों की छतों से भी पत्थर फेंके गए। हालात बिगड़ने पर वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी गई और अतिरिक्त पुलिस बल मौके पर पहुंचा।
पुलिस कार्रवाई और फायरिंग
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया। इसी दौरान फायरिंग की घटना सामने आई। हिंसा में चार युवकों की मौत हो गई, जबकि कई पुलिसकर्मी और प्रशासनिक अधिकारी घायल हुए थे। घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया।
आलम को गोली लगने का मामला
हिंसा के दौरान नखासा थाना क्षेत्र के खग्गू सराय निवासी आलम (23) गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गया था। परिजनों का दावा है कि आलम उस दिन तीन पहिया ठेले पर बिस्कुट-टोस्ट बेचने निकला था और वह हिंसाग्रस्त इलाके में अनजाने में पहुंच गया।
आरोप है कि फायरिंग के दौरान उसकी पीठ में दो और हाथ में एक गोली लगी। पहले उसका इलाज स्थानीय अस्पताल में और फिर मेरठ के एक क्रिटिकल केयर सेंटर में कराया गया, जहां 26 नवंबर 2024 को ऑपरेशन कर शरीर से गोलियां निकाली गईं।
घायल से आरोपी बनने तक की कहानी
आलम के पिता यामीन की ओर से 4 फरवरी 2025 को सीजेएम कोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर किया गया। वकील चौधरी अख्तर सादेन का आरोप है कि इसके बाद पुलिस ने आलम को ही कोतवाली संभल के मुकदमा संख्या 333/2024 में गंभीर धाराओं के तहत नामजद आरोपी बना दिया।
पुलिस रिकॉर्ड में वांछित होने के कारण आलम को कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उसने हाई कोर्ट में जमानत याचिका भी दाखिल की, लेकिन राहत नहीं मिली।
कोर्ट का सख्त रुख
करीब डेढ़ साल तक चली सुनवाई के दौरान मामले में लगभग 15 तारीखें पड़ीं। आरोप है कि शुरुआती महीनों में पुलिस ने अपनी रिपोर्ट पूरी तरह पेश नहीं की। लंबी बहस के बाद सीजेएम ने सख्त रुख अपनाते हुए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।
न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट
हिंसा की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता वाले आयोग ने करीब 450 पन्नों की रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपी।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि संभल हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि पूर्व-नियोजित साजिश का परिणाम थी। आयोग ने हिंसा में बाहरी असामाजिक तत्वों की भूमिका, विदेशी हथियारों के इस्तेमाल और अवैध हथियारों की बड़ी खेप का उल्लेख किया है।
पुलिस का पक्ष और एसपी का बयान
कोर्ट के आदेश के बाद संभल एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कहा कि हिंसा के दौरान जिन लोगों को गोली लगी, वे 32 बोर की गोलियां थीं, जिनका प्रयोग पुलिस नहीं करती। उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम और बैलिस्टिक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है।
एसपी ने कहा कि न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट कैबिनेट में पेश की जा चुकी है और कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जाएगी।
निष्कर्ष
संभल हिंसा मामला अब एक बार फिर सुर्खियों में है। एक ओर न्यायिक आयोग की रिपोर्ट साजिश और दंगाइयों की भूमिका की बात करती है, वहीं दूसरी ओर अदालत ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए एफआईआर के आदेश दिए हैं। आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर और गर्माने की संभावना है।