Thursday, May 14

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गढ़वाल हिमालय में जनवरी में नहीं हुई बर्फबारी, जड़ी-बूटियों और पारिस्थितिकी पर खतरा

 

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देहरादून। उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र में जनवरी माह में बर्फबारी न होना एक गंभीर जलवायु असामान्यता के रूप में सामने आया है। पिछले 40 वर्षों के रिकॉर्ड में यह पहला मौका है जब तुंगनाथ की ऊंची चोटियां जनवरी के अंत तक बर्फ से ढकी नहीं दिखीं। इस घटना ने पर्यावरणविदों और जलवायु विशेषज्ञों में चिंता बढ़ा दी है।

 

औषधीय पौधों पर असर

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बारिश और बर्फबारी में कमी ने अल्पाइन क्षेत्र की प्रमुख औषधीय पौधों की प्रजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। इसमें जटामांसी (नार्डोस्टैचिस जटामांसी), कुटकी (पिक्रोराइजा कुर्रोआ) और अतीस (एकोनिटम हेट्रोफिलम) शामिल हैं। बारिश और बर्फ के अभाव से इन दुर्लभ औषधीय पौधों की वृद्धि और संरक्षण खतरे में है।

 

विज्ञानी क्या कहते हैं

तुंगनाथ स्थित हाई एल्टीट्यूड प्लांट फिजियोलॉजी रिसर्च सेंटर (HAPPRC) के संस्थापक वैज्ञानिक आदित्य नारायण पुरोहित का कहना है कि क्षेत्र में प्राकृतिक वर्षा चक्र में बदलाव देखा जा रहा है। 12,000 फीट की ऊंचाई पर सर्दियों में बर्फबारी का न होना अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।

 

अन्य वैज्ञानिकों ने बताया कि कई हिमालयी औषधीय पौधों की प्रजातियां मिट्टी की नमी बनाए रखने, बीज की सुप्त अवस्था को तोड़ने और अंकुरण के लिए लगातार बर्फ पर निर्भर करती हैं। बर्फ की कमी से इन प्रक्रियाओं में विलंब हो रहा है। शुष्क हवा और सूखी मिट्टी अल्पाइन पारिस्थितिकी तंत्र की सामान्य प्रक्रिया को बाधित कर रही है।

 

बर्फ का प्राकृतिक महत्व

HAPPRC के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुदीप सेमवाल ने बताया कि बर्फ मिट्टी के लिए एक प्राकृतिक इन्सुलेटर का काम करती है। यह गर्मी के नुकसान को रोककर जड़ों को सुरक्षित रखती है और पौधों के जीवित रहने और शुरुआती विकास में मदद करती है। अधिकांश प्रजातियां मूल निवासी हैं और हिमालयी परिस्थितियों के लिए अनुकूलित हैं।

 

1985 से क्षेत्र में व्यवस्थित बर्फबारी के रिकॉर्ड बनाए जा रहे हैं। जनवरी 2026 में केवल पाला पड़ा है और कोई बर्फबारी दर्ज नहीं हुई, जिससे वैज्ञानिकों में चिंता की लहर दौड़ गई है।

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