
नई दिल्ली/वॉशिंगटन।
वैश्विक आर्थिक और सामरिक समीकरणों के बीच भारत की बढ़ती भूमिका को एक और अहम संकेत मिला है। अमेरिका ने भारत को जी7 देशों के वित्त मंत्रियों की विशेष बैठक में शामिल होने का न्योता दिया है। यह बैठक 12 जनवरी को वाशिंगटन में आयोजित होगी, जिसमें क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) की सप्लाई चेन को सुरक्षित और मजबूत बनाने पर चर्चा की जाएगी।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि भारत को इस बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि भारत ने अभी तक इस निमंत्रण को स्वीकार किया है या नहीं। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी देश रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहे हैं।
क्या है जी7 और क्यों अहम है यह बैठक?
जी7 समूह में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, इटली और कनाडा शामिल हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ भी इस मंच का हिस्सा है। ये सभी देश आज भी कई जरूरी खनिजों के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर हैं।
इन खनिजों का इस्तेमाल डिफेंस टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और औद्योगिक रिफाइनिंग जैसे अहम क्षेत्रों में होता है।
चीन की पकड़ से बढ़ी पश्चिमी देशों की चिंता
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के मुताबिक, चीन दुनिया भर में कॉपर, लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की रिफाइनिंग का 47 से 87 प्रतिशत तक नियंत्रण करता है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन द्वारा रेयर अर्थ और उससे जुड़े उत्पादों पर निर्यात नियंत्रण लगाए जाने से पश्चिमी देशों की चिंता और गहरी हो गई है।
हाल ही में यह भी खबरें सामने आईं कि चीन ने जापान की कंपनियों को रेयर अर्थ और हाई-पावर्ड मैग्नेट के निर्यात पर रोक लगा दी है और जापानी सेना से जुड़े कुछ सामानों की शिपमेंट पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।
सप्लाई चेन मजबूत करने पर जोर
स्कॉट बेसेंट ने बताया कि पिछले साल जी7 नेताओं की बैठक के बाद से ही क्रिटिकल मिनरल्स पर एक अलग बैठक की जरूरत महसूस की जा रही थी। दिसंबर में इस विषय पर वित्त मंत्रियों की एक वर्चुअल बैठक भी हो चुकी है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि चीन, अमेरिका से सोयाबीन खरीदने और कुछ खनिजों की सप्लाई को लेकर अपने वादों का पालन कर रहा है।
भारत की भूमिका क्यों अहम?
क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में भारत को एक विश्वसनीय वैकल्पिक साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। भारत के पास खनन, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन को विविध बनाने की क्षमता है। ऐसे में जी7 की इस बैठक में भारत की भागीदारी, वैश्विक स्तर पर उसकी रणनीतिक और आर्थिक अहमियत को और मजबूत कर सकती है।
निष्कर्ष
जी7 की यह बैठक केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ी है। चीन की वैश्विक पकड़ को संतुलित करने की कोशिशों के बीच भारत का आमंत्रण इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में वैश्विक सप्लाई चेन की राजनीति में भारत की भूमिका और निर्णायक हो सकती है।