
पटना (सुधेंद्र प्रताप सिंह/रमाकांत चंदन) – बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनकी पार्टी के तीन बागी विधायकों – रामेश्वर महतो, आलोक सिंह और माधव आनंद – ने पार्टी पर दावा कर दिया है, जिससे कुशवाहा के सामने सियासी संकट और बढ़ गया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, बागी विधायकों का पार्टी पर कोई बड़ा असर नहीं है। ये विधायक अपने दम पर चुनाव जीतने की ताकत नहीं रखते और राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि उनका महत्व सीमित है। हालांकि, ये विधायकों जदयू और बीजेपी के शीर्ष नेताओं से भी मिल चुके हैं, लेकिन किसी भी पार्टी ने उनका हौसला बढ़ाने की दिशा में कदम नहीं उठाया।
बागी विधायकों का भविष्य
बागी विधायकों के पास फिलहाल एक ही रास्ता बचता है – अलग गुट का गठन। इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार के पास भेजा जा सकता है, जो सरकार की तरफ से इशारे के बाद उन्हें अलग गुट के रूप में मान्यता दे सकते हैं। हालांकि, अलग गुट में रहते हुए भी ये विधायक एनडीए के भीतर ही रहेंगे। वर्ष 2030 के विधानसभा चुनाव तक इनमें से कोई भी विधायक अपने दम पर जीत हासिल करने की स्थिति में नहीं है।
संगठन का साथ नहीं
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के संगठन में बागी विधायकों का कोई समर्थन नहीं है। जब रामेश्वर महतो, माधव आनंद और आलोक सिंह को टिकट मिला था, तब पार्टी में विरोध की लहरें उठी थीं। अब जब बागी विधायकों के स्वर उपेंद्र कुशवाहा के विरुद्ध उठे हैं, तो संगठन का रुख उनके पक्ष में नहीं है।
उपेंद्र कुशवाहा का अंतिम दांव
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उपेंद्र कुशवाहा का अंतिम कदम जदयू में राष्ट्रीय लोक मोर्चा का विलय हो सकता है। इससे पार्टी भी बच जाएगी और तीनों बागी विधायक भी जदयू के विधायक बन जाएंगे। उपेंद्र कुशवाहा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दोस्ती का लाभ लेकर यह विलय संभव है। पहले भी रालोसपा का विलय जदयू में हुआ था, और अब यही फार्मूला राष्ट्रीय लोक मोर्चा पर लागू किया जा सकता है।
बिहार की राजनीति में बागी विधायकों का यह खेल और उपेंद्र कुशवाहा का रणनीतिक कदम आने वाले समय में राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है।