Thursday, February 19

संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा कूटनीतिक कदम, वेस्ट बैंक मुद्दे पर 100 देशों संग इजरायल की आलोचना

तेल अवीव/नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र (UN) में भारत ने एक अहम कूटनीतिक कदम उठाते हुए वेस्ट बैंक में इजरायल द्वारा किए जा रहे एकतरफा फैसलों की आलोचना करने वाले देशों की सूची में अपना नाम जोड़ दिया है। यह फैसला इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि शुरुआत में भारत इस संयुक्त बयान से दूरी बनाए हुए था, लेकिन समय-सीमा समाप्त होने से ठीक पहले भारत ने अपना समर्थन देकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर सबको चौंका दिया।

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भारत के इस कदम को कई विशेषज्ञ “कूटनीतिक यूटर्न” के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि पहले जारी किए गए बयान में भारत शामिल नहीं था, लेकिन बाद में भारत ने इसमें भागीदारी कर दी।

पहले 85 देशों ने जारी किया था बयान, भारत बाद में शामिल हुआ

मंगलवार (17 फरवरी 2026) को संयुक्त राष्ट्र में 85 देशों ने वेस्ट बैंक को लेकर इजरायल की आलोचना करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया था। उस समय भारत का नाम इस सूची में शामिल नहीं था।

हालांकि, बुधवार (18 फरवरी 2026) देर रात समय सीमा समाप्त होने से ठीक पहले भारत ने भी इस बयान का समर्थन कर दिया, जिसके बाद यह संख्या बढ़कर लगभग 100 देशों तक पहुंच गई।

फिलिस्तीनी राजदूत ने पढ़ा बयान, इजरायल के कदमों की कड़ी निंदा

संयुक्त बयान को संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के राजदूत रियाद मंसूर ने पढ़ा। बयान में कहा गया कि वेस्ट बैंक में इजरायल की मौजूदगी और वहां नियंत्रण बढ़ाने के लिए उठाए गए कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं।

मंसूर ने कहा—
“हम वेस्ट बैंक में इजरायल की गैर-कानूनी मौजूदगी को मजबूत करने के मकसद से लिए गए एकतरफा फैसलों और कदमों की कड़ी निंदा करते हैं।”

बयान में यह भी कहा गया कि पूर्वी यरुशलम समेत 1967 से कब्जे वाले फिलिस्तीनी इलाकों की जनसंख्या संरचना और स्थिति बदलने की कोशिशें अस्वीकार्य हैं।

वेस्ट बैंक विवाद की वजह क्या है?

दरअसल, इजरायल ने वेस्ट बैंक के बड़े हिस्से को ‘स्टेट लैंड’ (राज्य भूमि) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा मजबूत करने की रणनीति मान रहा है।

गाजा में युद्धविराम के बाद इजरायली संसद (नेसेट) ने कई प्रस्ताव पास किए हैं, जिनका उद्देश्य वेस्ट बैंक के A और B क्षेत्रों में नियंत्रण बढ़ाना है। ये वही क्षेत्र हैं, जिन्हें ओस्लो समझौते (1993-95) के बाद फिलिस्तीनी अथॉरिटी के प्रशासन में रखा गया था।

भारत के शामिल न होने पर उठे थे सवाल, पूर्व राजनयिकों ने जताई नाराजगी

जब भारत का नाम शुरुआती सूची में नहीं था, तब भारत की विदेश नीति पर सवाल उठने लगे थे। कई पूर्व भारतीय राजनयिकों ने इसे भारत की पारंपरिक नीति से हटने वाला कदम बताया था।

ईरान में भारत के पूर्व राजदूत केसी सिंह ने इसे “अफसोसजनक” करार देते हुए पूछा था कि क्या भारत अब खुलकर इजरायल का पक्ष ले रहा है।

भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा मेनन राव ने भी टिप्पणी करते हुए कहा था कि रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब विकल्प बढ़ाना होना चाहिए, न कि नैतिक रुख कमजोर करना।

PM मोदी की इजरायल यात्रा से पहले बदला रुख, अंतरराष्ट्रीय संदेश साफ

भारत का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25-26 फरवरी को इजरायल दौरे पर जाने वाले हैं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले ही इस यात्रा की पुष्टि कर चुके हैं।

ऐसे में भारत का संयुक्त बयान में शामिल होना यह संकेत देता है कि भारत इजरायल के साथ मजबूत रिश्तों के बावजूद फिलिस्तीन मुद्दे पर अपने पारंपरिक और संतुलित रुख को बनाए रखना चाहता है।

निष्कर्ष: भारत ने दुनिया को दिया संतुलन और सिद्धांत का संदेश

संयुक्त राष्ट्र में इजरायल की आलोचना करने वाले देशों के साथ खड़े होकर भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह रणनीतिक मित्रता निभाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय आधारित दृष्टिकोण को भी महत्व देता है।

यह कदम भारत की विदेश नीति में संतुलन, कूटनीतिक चतुराई और वैश्विक जिम्मेदारी को दर्शाता है, जो आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीति में भारत की भूमिका को और मजबूत कर सकता है

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