
ईरान में बनते-बिगड़ते सुरक्षा हालात ने भारत की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। इसी कड़ी में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने अपने डिप्टी पवन कपूर को विशेष मिशन पर तेहरान भेजा। वहां उन्होंने ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लाजिरानी समेत वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों से मुलाकात की।
यह दौरा ऐसे समय हुआ है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है और ईरान को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार तेज होता जा रहा है।
क्यों अहम है ईरान भारत के लिए?
भारत और ईरान वैचारिक रूप से भले ही एक-दूसरे के नजदीक न हों, लेकिन रणनीतिक और कूटनीतिक मजबूरियों ने दोनों देशों को जोड़ रखा है। भारत के लिए ईरान सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का सबसे अहम द्वार है।
पाकिस्तान के कारण भारत का सीधा रास्ता बाधित रहता है, ऐसे में ईरान ही वह मार्ग है, जो भारत को इस क्षेत्र से जोड़ता है।
चाबहार पोर्ट: भारत की सबसे बड़ी चिंता
भारत की ईरान में सबसे बड़ी रणनीतिक परिसंपत्ति है चाबहार बंदरगाह। यह बंदरगाह न सिर्फ व्यापार के लिहाज से अहम है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का भी अहम हिस्सा बन चुका है।
यदि ईरान में राजनीतिक या सुरक्षा अस्थिरता बढ़ती है, तो चाबहार परियोजना पर सीधा असर पड़ सकता है। इससे भारत के हितों को नुकसान पहुंचेगा और क्षेत्र में पाकिस्तान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में ईरान के साथ खड़ा रहा भारत
ईरान को लेकर भारत की चिंता हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में भी देखने को मिली। यूएन ह्यूमन राइट्स काउंसिल में ईरान के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर भारत ने समर्थन नहीं किया और इसके विरोध में मतदान किया।
भारत के इस रुख ने साफ कर दिया कि वह ईरान को पूरी तरह अलग-थलग किए जाने के पक्ष में नहीं है। इस मुद्दे पर भारत के साथ चीन, क्यूबा और वियतनाम जैसे देश ही खड़े दिखे।
ईरान ने दिलाया पुराने रिश्तों का भरोसा
हाल ही में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने भारत-ईरान संबंधों को 3,000 साल पुराना बताया। उन्होंने कहा कि यह रिश्ता इस्लाम के आगमन से भी पहले का है और दोनों सभ्यताओं के बीच गहरे सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंध रहे हैं।
तेहरान बार-बार यह संदेश दे रहा है कि वह भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मानता है।
भारत के लिए अस्थिर ईरान क्यों खतरनाक?
भारत ने ईरान को कभी वैचारिक सहयोगी नहीं माना, लेकिन ज़रूरत आधारित साझेदारी दोनों देशों को जोड़ती है।
ईरान कमजोर पड़ा तो पाकिस्तान को क्षेत्रीय बढ़त मिल सकती है
कश्मीर जैसे मुद्दों पर ईरान का भारत के पक्ष में रुख बदल सकता है
अफगानिस्तान और मध्य एशिया में भारत की मौजूदगी प्रभावित हो सकती है
ऊर्जा और व्यापारिक हितों पर भी खतरा बढ़ेगा
डोभाल का संदेश: हालात पर करीबी नजर
इन्हीं तमाम चिंताओं को देखते हुए एनएसए अजीत डोभाल ने अपने डिप्टी को तेहरान भेजकर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत ईरान के घटनाक्रम को नजरअंदाज नहीं कर सकता।
यह दौरा भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अपने अहम साझेदारों के साथ संवाद बनाए रखते हुए क्षेत्रीय संतुलन और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना चाहता है।
स्पष्ट है कि ईरान में हालात बिगड़ना भारत के लिए सिर्फ एक विदेशी संकट नहीं, बल्कि सीधी सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौती है—और इसी वजह से नई दिल्ली पूरी सतर्कता के साथ हर कदम उठा रही है।