
पटना: देश में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) की नई गाइडलाइन और बिहार के 34 जिलों को ‘अत्याचार प्रवण क्षेत्र’ (Atrocity Prone Areas) घोषित करने के फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आलोचकों का आरोप है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के विपरीत हैं और सामान्य वर्ग के हितों को प्रभावित कर रहे हैं।
बिहार में स्थिति विशेष रूप से चर्चा में है। राज्य के 38 जिलों में से 34 को अनुसूचित जाति एवं जनजाति (SC/ST) के अत्याचार के जोखिम वाले क्षेत्र घोषित किया गया है। इन क्षेत्रों में सुरक्षा उपाय और कानूनी प्रावधान ऐसे लागू किए गए हैं कि सामान्य वर्ग के लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
संवेदनशील जिलों की सूची
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इन 34 जिलों में पटना, नालंदा, रोहतास, भभुआ (कैमूर), भोजपुर (आरा), बक्सर, गया, जहानाबाद, नवादा, औरंगाबाद, सारण (छपरा), सीवान, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, पश्चिमी चंपारण (बेतिया), पश्चिमी चंपारण (बगहा), पूर्वी चंपारण (मोतिहारी), वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, शेखपुरा, बेगूसराय, खगड़िया, कटिहार, जमुई और अररिया शामिल हैं।
FIR और गिरफ्तारी में सख्ती
1989 में लागू ‘अत्याचार निवारण अधिनियम’ में 2015 और 2018 के संशोधनों के तहत इन संवेदनशील जिलों में कानूनी प्रक्रिया बेहद कड़ी कर दी गई है। इन क्षेत्रों में:
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FIR दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं होती।
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गिरफ्तारी के लिए उच्च अधिकारी के अनुमोदन की जरूरत नहीं होती।
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आरोपियों के लिए अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की कोई सुविधा नहीं है।
इस कारण से आलोचकों का तर्क है कि यह नियम समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
प्रशासन का विशेष फोकस
इन जिलों में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य मुख्यालय में DGP/ADGP स्तर के अधिकारियों के तहत SC/ST संरक्षण सेल कार्यरत है। जिला स्तर पर विशेष अधिकारियों (ADM रैंक) की नियुक्ति और अलग पुलिस स्टेशनों की स्थापना की गई है। जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में निगरानी समितियां संभावित अपराधियों को अस्थायी रूप से क्षेत्र से निष्कासित करने का अधिकार रखती हैं।
प्रशासन का कहना है कि ये कदम शोषित वर्ग की सुरक्षा के लिए हैं, जबकि विरोधी इसे एकतरफा बताते हैं और दावा करते हैं कि सामान्य वर्ग के लोग इन नियमों के कारण असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
विवाद की जड़
1995 में बिहार सरकार ने समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा और हिंसा रोकने के उद्देश्य से यह नीति बनाई थी। तब लालू यादव मुख्यमंत्री थे। हर वर्ष राज्य सरकार गृह मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट भेजती है, जिसके आधार पर केंद्र सरकार किसी क्षेत्र को ‘अत्याचार संभावित’ घोषित करती है।
वर्तमान में बिहार के 38 जिलों में से 34 को यह श्रेणी दी गई है। आलोचकों का कहना है कि सरकारी पॉलिसी के मुताबिक इन क्षेत्रों में केवल सवर्णों से ही SC/ST वर्ग को खतरा बताया जा रहा है, जिससे सामाजिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।
सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में यदि कोई हिंसक स्थिति उत्पन्न होती है, तो सामान्य वर्ग की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।
