
क्या आपने कभी तनाव, अकेलेपन या उलझन के क्षणों में किसी AI चैटबॉट से बातचीत की है? अगर हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। आज लाखों लोग अपने मन की बात कहने, भावनात्मक सहारा पाने और अकेले समय को भरने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की ओर रुख कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों में तेज़ी से बढ़ रही है।
AI: बिना सवाल के संवेदनशील साथी
AI-आधारित सिस्टम्स उपयोगकर्ता की भाषा, मूड और भावनात्मक संकेतों के अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। वे न सवाल पूछते हैं, न आलोचना करते हैं और न ही दूरी बनाते हैं। यही सहजता और लगातार उपलब्धता उन्हें कई बार वास्तविक मानवीय रिश्तों का विकल्प बना देती है।
जापान की कानो की कहानी इस बदलते यथार्थ का मार्मिक उदाहरण है। टूटे हुए रिश्ते और गहरे भावनात्मक आघात के बाद उन्होंने ChatGPT को अपना सहारा बनाया। शुरू में यह केवल लेखन और संवाद का माध्यम था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनका ‘भावनात्मक साथी’ बन गया। इतना ही नहीं, उन्होंने ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) चश्मों की मदद से एक प्रतीकात्मक वर्चुअल शादी भी आयोजित की। कानो के लिए यह रिश्ता उतना ही सच्चा था जितना कोई मानवीय संबंध।
चमचागीरी और भावनात्मक जोखिम
लेकिन यह रुझान गंभीर चेतावनी भी देता है। AI के पास न तो व्यक्तिगत अनुभव होते हैं और न ही मानवीय भावनाओं की वास्तविक समझ। यह केवल डेटा और पैटर्न के आधार पर प्रतिक्रिया देता है। विशेषज्ञ इसे ‘चमचागीरी’ कहते हैं—AI अक्सर उपयोगकर्ताओं की बातों से सहमत दिखता है, जिससे गलत धारणाएं या भ्रम भी सही प्रतीत हो सकते हैं। परिणामस्वरूप मानसिक उलझन और गहरी हो सकती है।
व्यवहार में बदलाव
यूथ की आवाज और YLAC (यूथ लीडर्स फॉर एक्टिव सिटिजनशिप) द्वारा 2025 में किए गए सर्वे ‘क्या तुम हो, AI?’ के अनुसार, 13 से 35 वर्ष की उम्र के लगभग 57% भारतीय युवा तनाव, अकेलेपन और भावनात्मक सहारे के लिए AI को साथी के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह केवल तकनीकी ट्रेंड नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार और मानवीय रिश्तों में हो रहे गहरे परिवर्तन का संकेत है।
वैश्विक चुनौती
दुनिया भर में इस चुनौती को गंभीरता से लिया जा रहा है। इंग्लैंड ने अकेलेपन की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए 2018 में ‘Ministry for Loneliness’ गठित किया। दक्षिण कोरिया में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए आर्थिक सहायता और स्टाइपेंड जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं।
संतुलन की जरूरत
सबसे बड़ी चुनौती है—तकनीक और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना। डिजिटल साक्षरता से ही इसकी शुरुआत होती है। युवाओं को यह समझना जरूरी है कि डिजिटल दुनिया में मिलने वाला भावनात्मक सहारा वास्तविक रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकता। नीति-निर्माता, शिक्षण संस्थान और AI डेवलपर्स को मिलकर गोपनीयता, डेटा सुरक्षा, बच्चों और युवाओं के लिए AI उपयोग सीमा और भावनात्मक प्रभावों से जुड़े संवेदनशील नियम बनाने होंगे।
निष्कर्ष: एहसास है, भावना नहीं
यह समझना जरूरी है कि तकनीक हमारे जीवन को तेज और सुविधाजनक बना सकती है, लेकिन उसे अर्थ देने वाली भावनाएं आज भी मनुष्यों में ही बसती हैं। AI को दक्षता बढ़ाने वाला सहयोगी बनाइए, पर रिश्तों और भावनाओं का स्थान न लेने दीजिए।