
नई दिल्ली: 19 जनवरी 1966 को संसद के केंद्रीय हॉल में अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला, जब कांग्रेस संसदीय दल ने पूर्ण मतदान के जरिए अपना नेता चुना। चार घंटे के नाटकीय घटनाक्रम के बाद 48 वर्षीय इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।
पृष्ठभूमि:
जनवरी 1966 में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में अचानक मौत के बाद प्रधानमंत्री का पद खाली हो गया। गुलजारी लाल नंदा ने एक्टिंग पीएम के तौर पर कमान संभाली, लेकिन सत्ता के लिए कांग्रेस में कड़ी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज के मार्गदर्शन में इंदिरा गांधी ने अपने पक्ष में समर्थन जुटाया।
सियासी टकराव और मोरारजी देसाई का विरोध:
इंदिरा गांधी, गुलजारी लाल नंदा और वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के बीच सत्ता की लड़ाई थी। मोरारजी ने आरोप लगाया कि सांसदों पर इंदिरा के पक्ष में दबाव डाला जा रहा है, जबकि कामराज ने इसे संघीय लोकतंत्र में राज्यों की भूमिका बताया।
मतदान और नतीजे:
19 जनवरी को केंद्रीय हॉल में 526 सांसदों ने मतदान किया। इंदिरा गांधी को 355 वोट मिले, जबकि मोरारजी देसाई को 169 वोट मिले। इंदिरा को वैध वोटों का लगभग 68 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ। परिणाम घोषित होते ही हॉल में जयकारों की गूंज सुनाई दी।
इंदिरा की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस:
इंदिरा गांधी ने पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “इस चुनाव में किसी तरह की अनुचित धांधली की आशंका निराधार है।” उन्होंने सार्वजनिक जीवन में निर्भीकता बनाए रखने का महत्व भी स्वीकार किया।
विश्व प्रतिक्रिया:
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं आईं। सोवियत न्यूज एजेंसी ताश ने इसे तुरंत कवर किया और लार्ड माउंटबेटेन ने इसे भारत में स्थिरता लाने वाला चुनाव बताया।