
नई दिल्ली: अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा रूस के कच्चे तेल पर पाबंदियों के बाद भारत के तेल आयात में करीब 29 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि इसका फायदा चीन उठा रहा है। CREA (Center for Research on Energy and Clean Air) के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात पिछले तीन वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।
रूसी तेल पर पाबंदी और वैश्विक असर:
6 जनवरी को पश्चिमी तुर्की के इजमित में पनामा झंडे वाले टैंकर ‘बेला 6’ ने लगभग 1 लाख टन रूसी तेल की डिलीवरी दी। यह यूरोपीय संघ के 21 जनवरी से लागू होने वाले प्रतिबंध से पहले की अंतिम आपूर्ति थी। नए प्रतिबंध के तहत रूसी कच्चे तेल से बने उत्पादों का EU में आयात बंद कर दिया गया है, जिसका उद्देश्य यूक्रेन में मॉस्को के युद्ध के लिए राजस्व में कमी लाना है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति अस्थिर हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल बढ़ रही है।
भारत ने खुद पर लगाई ‘पाबंदी’:
कुछ प्रमुख भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल की खरीद पर रोक लगा दी। CREA के अनुसार, दिसंबर में भारत का आयात 29 प्रतिशत गिर गया। इस गिरावट का एक बड़ा कारण अमेरिका द्वारा रूस की प्रमुख तेल कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध भी बताए जा रहे हैं।
तेल का नया गंतव्य – चीन:
विश्लेषकों का मानना है कि भारत और तुर्की द्वारा छोड़े गए अतिरिक्त रूसी तेल का एक हिस्सा चीन अवशोषित कर रहा है। CREA के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में रूस से चीन के समुद्री मार्ग के माध्यम से कच्चे तेल का आयात 23 प्रतिशत बढ़ गया। चीन की टी-पॉट्स रिफाइनरियां सस्ते तेल की खरीद में माहिर हैं और आवश्यकतानुसार रूसी और ईरानी तेल के बीच अदला-बदली करती रहती हैं।
भविष्य की चुनौती:
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पूरी मात्रा खरीद नहीं पाएगा, लेकिन सस्ते तेल पर वह सक्रिय रहेगा। अमेरिका और यूरोपीय संघ की नजर अब चीन पर है, और इसके लिए और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता जताई जा रही है, ताकि रूस के निर्यात राजस्व पर दबाव बना रहे।
CREA के विश्लेषक इसहाक लेवी ने कहा, “रूस के निर्यात राजस्व को कम करने के लिए और कदम जरूरी हैं। हालांकि चीन की बड़ी कंपनियां सतर्क हैं, छोटी कंपनियां प्रतिबंधों से कम प्रभावित होती हैं और सस्ते तेल का लाभ उठाने के लिए तैयार रहती हैं।”