
खगड़िया।
आजादी के सात दशक बाद भी बिहार के खगड़िया जिले का अलौली प्रखंड विकास की बुनियादी कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया है। बागमती नदी पर एक स्थायी पुल के अभाव में दियारा क्षेत्र के 10 से अधिक गांवों की करीब 50 हजार आबादी आज भी जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर है। मोहरा घाट, कोलवारा, शहरबन्नी समेत कई गांवों के लोगों के लिए नदी पार करना रोजमर्रा की मजबूरी है, जहां नाव और बांस से बने अस्थायी चचरी पुल ही जीवनरेखा बने हुए हैं।
बरसात के दिनों में जब बागमती उफान पर होती है, तब यह सफर और भी भयावह हो जाता है। तेज धार, ओवरलोड नावें और जर्जर चचरी पुल हर पल हादसे को न्योता देते हैं। इसके बावजूद ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
नदी पार करना जानलेवा ही नहीं, महंगा भी
पुल के अभाव ने ग्रामीणों की जेब पर भी भारी बोझ डाल दिया है। निजी नाव संचालक नदी पार कराने के नाम पर मनमाना किराया वसूलते हैं।
- प्रति व्यक्ति: 10 रुपये
- बाइक: 40 रुपये
- चार पहिया वाहन: 400 रुपये
छोटी-छोटी देशी नावों पर क्षमता से अधिक भार और मानसून में बढ़ता जलस्तर हर वक्त बड़े हादसे की आशंका पैदा करता है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के आगे ग्रामीण खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर सीधा असर
स्थानीय ग्रामीणों और सरकारी शिक्षकों—साधु पासवान, मंजूर आलम और अजमेर आलम—का कहना है कि स्थायी पुल न होने से पूरा इलाका विकास की दौड़ में पिछड़ गया है। छात्रों और शिक्षकों को स्कूल पहुंचने में भारी परेशानी होती है, जिससे शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
मेडिकल इमरजेंसी के समय मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में देरी जानलेवा साबित हो जाती है। वहीं किसानों को मंडियों तक सीधी पहुंच न होने के कारण उनकी उपज का उचित मूल्य भी नहीं मिल पाता।
‘अगर घाट’ पर पुल की मांग, फाइलों में कैद
खगड़िया–सहरसा जिला सीमा पर स्थित ‘अगर घाट’ पर पुल निर्माण की मांग वर्षों पुरानी है, लेकिन यह आज भी सरकारी फाइलों में सिमटी हुई है। अलौली के जदयू विधायक रामचंद्र सदा ने माना है कि वे इस समस्या से अवगत हैं और इसे मुख्य सचिव व संबंधित अधिकारियों के समक्ष उठाने का आश्वासन दिया है।
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि हर चुनाव में आश्वासन मिलते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदलती। सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की लगातार मांग के बावजूद पुल निर्माण अब तक सिर्फ सपना ही बना हुआ है।
विकास की आस में इंतजार
बागमती नदी पर एक स्थायी पुल न सिर्फ दूरी घटाएगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और रोजगार के नए रास्ते भी खोलेगा। फिलहाल अलौली के दियारा क्षेत्र के लोग हर दिन अपनी जान हथेली पर रखकर नदी पार करने को मजबूर हैं—और एक सवाल पूछ रहे हैं, क्या उन्हें अब भी विकास के लिए इंतजार करना होगा?