Monday, January 19

बिहार में ‘ऑपरेशन कांग्रेस’ की सरगर्मी, पर नीतीश कुमार बने सबसे बड़ा ट्विस्ट छह विधायकों के दलबदल पर क्यों हिचक रहे हैं मुख्यमंत्री?

पटना।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर दलबदल की आहट तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के सभी छह विधायक जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का दामन थाम सकते हैं। हालांकि इस संभावित ‘ऑपरेशन कांग्रेस’ में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बन गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अब तक मुख्यमंत्री की हरी झंडी नहीं मिल पाई है।

This slideshow requires JavaScript.

दरअसल, चुनाव परिणाम आने के बाद से ही कांग्रेस विधायकों के टूटने की अटकलें लगाई जा रही थीं। उस समय मामला चर्चाओं तक ही सीमित रह गया था, लेकिन अब हालात कुछ अलग बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस बार कांग्रेस विधायकों के साथ जदयू नेताओं की बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और विधायकों में भी स्पष्ट रुचि देखी जा रही है।

कांग्रेस विधायकों की बढ़ी सक्रियता

कांग्रेस विधायकों के करीबी सूत्रों के अनुसार, पार्टी के छह विधायक—अभिषेक रंजन, मनोज बिस्वान, मोहम्मद कमरुल होदा, मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद और आबिदुर रहमान—की प्रारंभिक बातचीत जदयू के वरिष्ठ नेताओं से हो चुकी है। मंत्रिमंडल में स्थान, संगठनात्मक पद और अन्य राजनीतिक मांगों को लेकर भी सहमति बनती दिख रही है।
हाल के दिनों में कांग्रेस विधायकों की नाराजगी भी खुलकर सामने आई है। वे सदाकत आश्रम में आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज से नदारद रहे, वहीं मनरेगा बचाओ अभियान की बैठक में भी उनकी अनुपस्थिति ने सियासी संकेत दिए।

नीतीश कुमार क्यों नहीं दे रहे हरी झंडी?

सबसे अहम सवाल यही है कि जब जमीन तैयार है, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस दलबदल को लेकर क्यों हिचक रहे हैं? सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार नहीं चाहते कि बिहार में कांग्रेस पूरी तरह कमजोर हो। उनका मानना है कि विधानसभा में और राज्य की राजनीति में एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है।
यदि कांग्रेस के छह विधायक जदयू में शामिल होते हैं, तो जदयू भले ही सबसे बड़ी पार्टी बन जाए, लेकिन इससे सरकार की स्थिरता पर कोई निर्णायक असर नहीं पड़ेगा। उलटे, पार्टी तोड़ने के आरोप, राजनीतिक अविश्वास और अस्थिरता का माहौल बन सकता है।

सूत्र यह भी बताते हैं कि कांग्रेस विधायकों के शामिल होने से भाजपा भी असमंजस में पड़ सकती है और नीतीश कुमार पर अविश्वास बढ़ेगा। इसके साथ ही, बिहार में विधायकों को तोड़ने का सिलसिला शुरू हो सकता है, जिसमें अन्य दल—जैसे आरएलएम, एआईएमआईएम और बसपा—भी निशाने पर आ सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक ‘खरीद-फरोख्त’ का दौर शुरू होने का खतरा है, जिसे नीतीश कुमार टालना चाहते हैं।

2018 की यादें और मौजूदा सियासत

हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस में टूट की चर्चा जदयू से जुड़ी हो। मार्च 2018 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जन्मदिन के अवसर पर कांग्रेस के चार विधान पार्षद—अशोक चौधरी, दिलीप चौधरी, तनवीर अख्तर और रामचंद्र भारती—ने कांग्रेस छोड़कर जदयू की सदस्यता ग्रहण की थी। उस समय इस घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में खासा हलचल मचाई थी।

आगे क्या?

फिलहाल ‘ऑपरेशन कांग्रेस’ को लेकर जमीन भले ही तैयार दिख रही हो, लेकिन अंतिम फैसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रुख पर टिका है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश कुमार फिलहाल किसी ऐसे कदम से बचना चाहते हैं, जिससे बिहार की राजनीति में अस्थिरता और अविश्वास का माहौल पैदा हो।
अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह सियासी पटकथा किस मोड़ पर पहुंचती है—कांग्रेस टूटती है या नीतीश कुमार का ‘ट्विस्ट’ इस पूरे ऑपरेशन को रोक देता है।

 

Leave a Reply