Wednesday, January 14

ईरान को वेनेजुएला न समझें ट्रंप, दबाव के आगे नहीं झुकेगा खामेनेई का देश: भारत के लिए भी बढ़ी चिंता

 

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शिया बहुल देश ईरान इन दिनों अभूतपूर्व उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। गिरती अर्थव्यवस्था, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन अब हिंसक रूप ले चुके हैं। देश के 50 से अधिक शहरों में फैली इस अशांति में अब तक 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। हालात की गंभीरता को देखते हुए ईरान सरकार ने इंटरनेट सेवाएं बंद, एयरस्पेस पर प्रतिबंध और पूरे देश में हाई अलर्ट घोषित कर दिया है।

 

इन हालात के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि “ईरान किसी भी दबाव के आगे झुकेगा नहीं।” खामेनेई ने आरोप लगाया कि देश में भड़काए जा रहे ये प्रदर्शन विदेशी ताकतों की साजिश का हिस्सा हैं, जिनका मकसद इस्लामी गणराज्य को अस्थिर करना है।

 

ट्रंप की धमकी और बढ़ता टकराव

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान के प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने और मदद पहुंचाने का ऐलान किया था। इसके बाद ईरान-अमेरिका टकराव एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। खामेनेई का बयान ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया पहले ही युद्ध और अस्थिरता की आग में झुलस रहा है।

 

ईरान के नजरिये से यह टकराव नया नहीं है। साल 2018 में ट्रंप द्वारा ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका को बाहर निकालना तेहरान के लिए एक कूटनीतिक विश्वासघात था। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की पुष्टि के बावजूद समझौता तोड़े जाने से ईरान को यह संदेश मिला कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

 

‘मैक्सिमम प्रेशर’ और आर्थिक युद्ध

 

साल 2025 में ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद ईरान पर एक बार फिर ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति लागू की गई। तेल निर्यात पर रोक, बैंकिंग चैनलों को बंद करना और वैश्विक वित्तीय प्रणाली से अलग-थलग करना—ईरान इसे सीधे तौर पर आर्थिक युद्ध मानता है। खामेनेई जब साजिश की बात करते हैं, तो इसी रणनीतिक और आर्थिक घेराबंदी की ओर इशारा करते हैं।

 

खाड़ी में ‘प्रॉक्सी वॉर’ से ‘ओपन वॉर’ तक

 

खाड़ी क्षेत्र में वर्षों से चला आ रहा छद्म युद्ध अब खुले संघर्ष में बदलता नजर आ रहा है। पिछले साल 21 जून को अमेरिका ने पहली बार ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमला किया। जवाब में ईरान ने कतर में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर मिसाइलें दागीं। खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, ड्रोन और मिसाइल रक्षा प्रणालियों की तैनाती को ईरान अपने अस्तित्व के लिए सीधा खतरा मानता है।

 

खामेनेई के बयान के सियासी मायने

 

खामेनेई का ‘न झुकने’ का ऐलान सिर्फ अमेरिका को संदेश नहीं है, बल्कि यह घरेलू राजनीति का भी अहम हिस्सा है। आर्थिक संकट और जन असंतोष के बीच नेतृत्व के लिए बाहरी दुश्मन की छवि गढ़ना और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना जरूरी हो जाता है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ ईरानी क्रांति के बाद से उसकी पहचान रही है और खामेनेई उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

 

रूस-चीन की ओर झुकता ईरान

 

अमेरिकी दबाव के जवाब में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार बढ़ाई, यूरेनियम संवर्धन तेज किया और पश्चिम से दूरी बनाकर रूस और चीन के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत की है। हाल ही में रूस, चीन और ईरान ने दक्षिण अफ्रीका के तट पर संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किया। यह साफ संकेत है कि दुनिया धीरे-धीरे एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय संतुलन की ओर बढ़ रही है।

 

भारत के लिए क्यों चिंता का विषय?

 

ईरान में बढ़ती हिंसा और अस्थिरता भारत के लिए भी चिंता का कारण है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह परियोजना, और पश्चिम एशिया में बसे करीब 90 लाख भारतीय प्रवासी इस संकट से सीधे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में भारत के लिए संतुलित, व्यावहारिक और दूरदर्शी कूटनीति अपनाना बेहद जरूरी है।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप को यह समझना होगा कि ईरान वेनेजुएला नहीं है। दशकों से वैश्विक दबाव झेलता आया यह देश प्रतिबंधों से टूटने के बजाय और अधिक आक्रामक और आत्मनिर्भर हुआ है। मौजूदा हालात न सिर्फ पश्चिम एशिया, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।

 

 

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