
दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेनाओं की ताजा रैंकिंग वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न वॉरशिप्स एंड सबमरीन (WDMMW) 2026 में जारी की गई है। इस रैंकिंग में जहाजों की संख्या, आधुनिकिकरण, लॉजिस्टिक सपोर्ट और युद्ध क्षमता को ध्यान में रखते हुए ट्रू वैल्यू रेटिंग का इस्तेमाल किया गया है।
रैंकिंग में भारत की नौसेना सातवें नंबर पर रही, जबकि पहले पांच में भारत का नाम शामिल नहीं है। यह भारतीय नौसेना के लिए झटका माना जा रहा है, क्योंकि क्षेत्रीय तनाव और चीन-पाकिस्तान जैसी नौसेनाओं की बढ़ती ताकत लगातार चिंता का विषय है।
दुनिया की टॉप-5 नौसेनाएं:
- अमेरिका: 11 एयरक्राफ्ट कैरियर्स और विशाल पनडुब्बी बेड़े के साथ अमेरिका की नौसेना पहले नंबर पर। सतह पर चलने वाले जहाजों और परमाणु ऊर्जा से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर्स के मामले में अमेरिका अभी भी बेजोड़ है।
- चीन: जहाजों की संख्या के मामले में चीन ने अमेरिका को चुनौती दी है। PLAN (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी) के पास 370 से अधिक जहाज और पनडुब्बियां हैं। चीन के पास 3 एयरक्राफ्ट कैरियर्स हैं, चौथा निर्माणाधीन है, और 2035 तक कुल 9 बनाने की योजना है।
- रूस: परमाणु हथियार ले जाने वाली पनडुब्बियों, आधुनिक एंटी-शिप मिसाइलों और लंबी दूरी की युद्ध शक्ति के कारण रूस की नौसेना तीसरे नंबर पर।
- इंडोनेशिया: TNI-AL के नाम से जानी जाने वाली इंडोनेशियाई नौसेना के पास 245 युद्धपोत हैं। यह “ब्लू-वॉटर ऑपरेशंस” के लिए अपनी क्षमताओं का विकास कर रहा है।
- दक्षिण कोरिया: 155 जहाजों और 22 पनडुब्बियों के साथ दक्षिण कोरिया की नौसेना एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बड़ी ताकत बनकर उभरी है।
भारत की नौसेना:
भारत सातवें स्थान पर है। भारतीय नौसेना के पास 2 एयरक्राफ्ट कैरियर्स (INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य), 19 पनडुब्बियां, 74 फ्लीट कोर और 5 एम्फीबियस असॉल्ट यूनिट हैं। इसके अलावा, अरहंत क्लास की दो परमाणु पनडुब्बियां भी हैं, जिनसे परमाणु मिसाइल लॉन्च की जा सकती हैं।
अन्य विवरण:
जापान की नौसेना को छठे स्थान पर रखा गया है।
पाकिस्तान की नौसेना 26वें स्थान पर है, उसके पास कोई एयरक्राफ्ट कैरियर नहीं है, जबकि 8 पनडुब्बियां और 28 फ्लीट कोर हैं। चीन ने पाकिस्तान को AIP टेक्नोलॉजी से लैस पनडुब्बियां सौंपना शुरू कर दिया है, जो जल्द ही ऑपरेशनल हो जाएंगी।
इस रैंकिंग से साफ संकेत मिलता है कि भारत को अपनी नौसैनिक क्षमताओं के आधुनिकीकरण और विस्तार पर तेजी से ध्यान देने की जरूरत है, ताकि क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक दबाव में संतुलन बना रहे।