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Indian Acts History: बेटी के लिए पिता की लड़ाई ने बदला भारत का मानसिक स्वास्थ्य कानून

नई दिल्ली, 9 जनवरी 2026: देश में मानसिक स्वास्थ्य के अधिकारों और देखभाल को नया आयाम देने वाला Mental Healthcare Act 2017 एक पिता की व्यक्तिगत लड़ाई की कहानी है। मुंबई के अमृत कुमार बख्शी ने अपनी बेटी ऋचा की मानसिक बीमारी के अनुभव से प्रेरित होकर देश के मानसिक स्वास्थ्य कानून को नई दिशा दी।

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बेटी की बीमारी से परिवार की चुनौती

1991 में ऋचा में सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण दिखने लगे। परिवार ने मुंबई में मेडिकल सलाह ली, लेकिन उचित मार्गदर्शन नहीं मिला। आगे पढ़ाई के लिए बड़ौदा जाने के बाद ऋचा की मानसिक स्थिति और बिगड़ गई। समाज में भेदभाव, रिश्तेदारों की दूरी और पड़ोसियों का डर, परिवार पर भारी पड़ा। बख्शी की पत्नी ने अपनी नौकरी छोड़कर बेटी की देखभाल की।

परिवार की सक्रियता और सुधार की पहल

कुछ समय बाद बख्शी का परिवार पुणे गया और ऋचा को सिज़ोफ्रेनिया अवेयरनेस एसोसिएशन (SAA) में भर्ती कराया गया। यहाँ पुनर्वास और समुदाय आधारित देखभाल पर जोर दिया जाता था। बख्शी भी संगठन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और बाद में अध्यक्ष बने। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य सुधार में सामुदायिक समर्थन की आवश्यकता पर जोर दिया।

मानसिक स्वास्थ्य कानून में बदलाव

बख्शी के अनुभव और सक्रियता ने उन्हें नीति निर्माण में ले आया। 2010 में निर्णय लिया गया कि 1987 के मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम में सुधार की जरूरत है। पुणे की इंडियन लॉ सोसाइटी को जिम्मेदारी दी गई, जिसमें बख्शी भी शामिल हुए। उन्होंने नए मेंटल हेल्थकेयर बिल का ड्राफ्ट तैयार करने में सक्रिय योगदान दिया और संसद की स्थायी समिति के सामने प्रेजेंटेशन भी दिया।

2017 में कानून के रूप में परिणित

2013 में बिल संसद में पेश किया गया और बख्शी को एक्सपर्ट ग्रुप में शामिल किया गया। 2017 में Mental Healthcare Act पारित हुआ। इस कानून ने मानसिक बीमारी के प्रति देश के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव किया:

  • नाबालिगों के लिए इलेक्ट्रोकॉनवल्सिव थेरेपी (ECT) पर रोक।
  • साइकियाट्रिक सेवाओं में साफसफाई, डॉक्यूमेंटेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर के मानक।
  • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और अधिकारों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश।

2016 में बख्शी ने ‘Mental Illness and Caregiving’ नामक किताब लिखी, जो मानसिक बीमारी वाले लोगों की देखभाल करने वालों के लिए शुरुआती मार्गदर्शिका बन गई।

सारांश:
एक पिता की बेटी के लिए लड़ाई ने न केवल उसके परिवार का जीवन बदला, बल्कि पूरे देश में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और अधिकारों को संरचित रूप दिया। आज Mental Healthcare Act 2017 इसी संघर्ष का प्रतीक है।

 

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