
बेतिया (पश्चिम चंपारण): बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में चेपुआ मछली ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन गई है। गंडक नदी में पाई जाने वाली इस छोटी मछली का अचार इतना लोकप्रिय है कि इसकी कीमत 1,200 रुपये प्रति किलो है। पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण यह काजू-किशमिश जैसे महंगे उत्पादों को भी पीछे छोड़ती है।
ग्रामीण आजीविका का स्रोत
बेतिया के धनाहा, बागाहा, पिपरासी और ठकराहा समेत आसपास के 2,000 से अधिक मछुआरे प्रतिदिन गंडक नदी में मछली पकड़ते हैं। मछली को सड़क किनारे ढाबों और अचार बनाने वालों तक पहुंचाया जाता है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार और आय मिलती है।
ढाबे पर तली हुई मछली 600-700 रुपये प्रति किलो बिकती है, जबकि ताजी मछली 250-350 रुपये में मिलती है। मझुआ गांव में चेपुआ मछली का अचार बेचने वाले राम सिंह के अनुसार, इसकी कीमत ज्यादा होने के बावजूद इसकी स्थिर मांग है।
स्वाद और पोषण में बेहतरीन
चेपुआ मछली हिलसा मछली से भी अधिक पौष्टिक मानी जाती है। इसमें ओमेगा-3, ओमेगा-6, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। 2015 में अमेरिकन फूड सोसाइटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन ने इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी में योगदान
वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के शोधकर्ता आशीष पांडा के अनुसार, चेपुआ मछली गंडक नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और मगरमच्छों और डॉल्फ़िन के लिए भोजन का स्रोत है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम
ढाबे के मालिक मदन कुशवाहा ने बताया कि चेपुआ मछली न केवल स्वाद में अनोखी है, बल्कि ग्रामीण आजीविका का आधार भी है। पनियाहावा और धनाहा के 20 से अधिक ढाबे रोजाना 20-25 किलो मछली भुजा के साथ परोसते हैं, जिससे प्रतिदिन 1,000-2,000 रुपये की शुद्ध आय होती है।
इस तरह चेपुआ मछली स्थानीय समुदाय के लिए रोजगार, पोषण और स्वाद का महत्वपूर्ण स्रोत बन गई है।