
आज के दौर में बच्चों की परवरिश किसी भी माता-पिता के लिए आसान नहीं मानी जाती, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मिलेनियल्स (1981 से 1996 के बीच जन्मी पीढ़ी) के लिए यह जिम्मेदारी और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। पेरेंटिंग कोच और एनएलपी प्रैक्टिशनर पुष्पा शर्मा के मुताबिक, इस पीढ़ी के माता-पिता को एक साथ कई सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे पेरेंटिंग पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल हो गई है।
एक साथ झेलने पड़ते हैं कई दबाव
पुष्पा शर्मा बताती हैं कि मिलेनियल पेरेंट्स को करियर, परिवार और बच्चों की परवरिश—तीनों को एक साथ संभालना पड़ रहा है। यह पीढ़ी न सिर्फ बेहतर माता-पिता बनना चाहती है, बल्कि बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत और सुरक्षित माहौल देने की भी कोशिश करती है, जिससे तनाव और जिम्मेदारियां दोनों बढ़ जाती हैं।
कमजोर हुआ फैमिली सपोर्ट सिस्टम
एक बड़ी वजह फैमिली सपोर्ट की कमी भी है। पहले संयुक्त परिवारों में दादी-नानी, चाचा-चाची जैसे रिश्तेदार बच्चों की देखभाल में सहयोग करते थे। लेकिन आज ज्यादातर परिवार न्यूक्लियर हो गए हैं। ऐसे में बच्चों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी माता-पिता को अकेले निभानी पड़ती है, जिससे मानसिक और शारीरिक थकावट (बर्नआउट) बढ़ रही है।
बढ़ता आर्थिक दबाव बना चिंता का कारण
एक्सपर्ट के अनुसार, आज के समय में महंगाई और आर्थिक असुरक्षा पेरेंटिंग को और कठिन बना रही है। घर खरीदना, बच्चों की पढ़ाई, हेल्थकेयर और नौकरी की अनिश्चितता—ये सभी चीजें माता-पिता पर भारी आर्थिक दबाव डालती हैं। इसका असर सीधे उनके मानसिक स्वास्थ्य और पेरेंटिंग स्टाइल पर पड़ता है।
सोशल मीडिया और एक्सपर्ट सलाह से बढ़ा कन्फ्यूजन
पुष्पा शर्मा बताती हैं कि सोशल मीडिया रील्स और अलग-अलग एक्सपर्ट्स की सलाह भी मिलेनियल्स के लिए उलझन पैदा कर रही है। हर प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग राय होने से माता-पिता अपने फैसलों पर शक करने लगते हैं। इससे ओवरथिंकिंग, गिल्ट और आत्म-संदेह बढ़ता है, जो पेरेंटिंग को और तनावपूर्ण बना देता है।
बच्चों का ओवर-एक्सपोजर भी बना चुनौती
आज के बच्चों को इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया का बहुत जल्दी एक्सपोजर मिल रहा है। ऑनलाइन बुलिंग, तुलना, कम उम्र में मैच्योर होना और अलग-अलग तरह की एडिक्शन जैसी समस्याएं माता-पिता की चिंता बढ़ा रही हैं। ऐसे में आज के पेरेंट्स को सिर्फ माता-पिता ही नहीं, बल्कि प्रोटेक्टर, मेंटर और काउंसलर की भूमिका भी निभानी पड़ रही है।
डिसिप्लिन और फ्रीडम के बीच संतुलन बनाना मुश्किल
एक्सपर्ट के मुताबिक, आज के समय में बच्चों के लिए सिर्फ अनुशासन ही नहीं, बल्कि इमोशनल सेफ्टी और सम्मान भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में डिसिप्लिन और फ्रीडम के बीच संतुलन बनाना माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। हर फैसले पर सोच-विचार और अनिश्चितता पेरेंटिंग को और जटिल बना देती है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर उपलब्ध एक वीडियो और एक्सपर्ट की राय पर आधारित है। एनबीटी इसकी पूर्ण सत्यता और सटीकता की जिम्मेदारी नहीं लेता। किसी भी निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।