
ताइपेई/बीजिंग।
चीन और ताइवान के बीच तनाव अब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि साइबर युद्ध के रूप में भी सामने आ रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2025 में चीन ने ताइवान पर प्रतिदिन औसतन 26 लाख साइबर हमले किए। यह आंकड़ा वर्ष 2023 की तुलना में 113 प्रतिशत अधिक है। इन हमलों का मकसद ताइवान की डिजिटल और तकनीकी व्यवस्था को बाधित करना बताया जा रहा है।
हाइब्रिड वॉरफेयर की रणनीति
ताइवान का आरोप है कि चीन ये साइबर हमले अपने सैन्य अभ्यासों के साथ तालमेल में करता है। विशेषज्ञ इसे चीन की ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ रणनीति का हिस्सा मानते हैं, जिसमें सैन्य दबाव के साथ-साथ साइबर हमलों के जरिए देश की आंतरिक व्यवस्थाओं को कमजोर किया जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन हमलों का सबसे ज्यादा असर ऊर्जा क्षेत्र, आपातकालीन सेवाओं, सरकारी विभागों और अस्पतालों पर पड़ा है। इससे आम नागरिकों को भी गंभीर असुविधाओं का सामना करना पड़ा।
चीन की ‘साइबर आर्मी’
सूत्रों के अनुसार, चीन ने एक संगठित ‘साइबर आर्मी’ तैयार की है, जो सेना और सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करती है। जब-जब चीनी सैन्य विमान ताइवान के आसपास सक्रिय हुए, उसी दौरान साइबर हमलों में भी तेज़ी देखी गई।
क्या होता है DDoS अटैक?
DDoS का पूरा नाम डिस्ट्रिब्यूटेड डिनायल ऑफ सर्विस (Distributed Denial of Service) है। इस हमले में हैकर्स हजारों-लाखों कंप्यूटरों या बॉट्स के ज़रिये किसी वेबसाइट या ऑनलाइन सिस्टम पर एक साथ भारी ट्रैफिक भेजते हैं।
परिणामस्वरूप वेबसाइट या डिजिटल सेवा ओवरलोड होकर ठप हो जाती है और आम लोग उसे एक्सेस नहीं कर पाते। सरकारी पोर्टल, अस्पतालों की ऑनलाइन सेवाएं और आपातकालीन सिस्टम ऐसे हमलों का प्रमुख निशाना बनते हैं।
मैन-इन-द-मिडिल अटैक से डेटा चोरी
DDoS के अलावा, ताइवान को मैन-इन-द-मिडिल (Man-in-the-Middle) अटैक का भी सामना करना पड़ रहा है। इस साइबर हमले में हैकर दो पक्षों के बीच हो रहे डिजिटल संवाद में खुद को शामिल कर लेता है।
इस दौरान वह बातचीत को सुन सकता है, उसमें हेरफेर कर सकता है और संवेदनशील निजी जानकारियां चुरा सकता है।
तकनीकी दबाव बढ़ाने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इन साइबर हमलों के ज़रिये ताइवान को तकनीकी, आर्थिक और मानसिक रूप से दबाव में लाना चाहता है। यह डिजिटल युद्ध भविष्य में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।