
वैश्विक चुनौतियों और अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ के बावजूद भारत के निर्यात मोर्चे से राहत भरी खबर सामने आई है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में देश का कुल निर्यात 840–850 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि 2026-27 में यह आंकड़ा 950 अरब डॉलर तक जा सकता है। निर्यातकों का मानना है कि यह वृद्धि मुख्य रूप से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA), टेक्नोलॉजी आधारित क्षेत्रों की मजबूती और बाजारों में विविधता के कारण संभव हो रही है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (FIEO) के महानिदेशक अजय सहाय के अनुसार, भारतीय निर्यात के लिए सबसे खराब दौर अब पीछे छूट चुका है। उन्होंने कहा कि सेवाओं, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल सेक्टर में तेजी से निर्यात बढ़ रहा है। डिजिटल सर्विसेज एक्सपोर्ट के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष पांच देशों में शामिल है।
50% अमेरिकी टैरिफ के बावजूद संतुलन
अमेरिका ने भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, जिसमें रूस से तेल आयात के कारण अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है। इसके बावजूद भारतीय उद्योग ने इस दबाव को काफी हद तक अपने कारोबार में समायोजित कर लिया है। निर्यातकों के मुताबिक लाल सागर संकट भी अब काफी हद तक सुलझ चुका है, जिससे लॉजिस्टिक्स में सुधार आया है।
केंद्र सरकार के एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के सहयोग से भारतीय कंपनियां नए उत्पादों और नए बाजारों की ओर रुख कर रही हैं। खास तौर पर पश्चिम एशिया निर्यात वृद्धि का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।
टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर से बड़ी उम्मीदें
टीटी लिमिटेड के एमडी संजय के जैन ने बताया कि अगले साल टेक्सटाइल निर्यात में 10 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है। भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, जीएसटी में संभावित कटौती, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर में ढील और ड्यूटी फ्री कॉटन जैसी घरेलू नीतियों से इस क्षेत्र को मजबूती मिलेगी।
इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में भी तेज बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यह क्षेत्र अब भारत की तीसरी सबसे बड़ी निर्यात श्रेणी बन चुका है।
अब तक का प्रदर्शन
वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से नवंबर के बीच भारत का कुल निर्यात 562.13 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 5.43 प्रतिशत अधिक है। वर्ष 2025 में भारत ने यूके और ओमान के साथ व्यापार समझौते किए, जबकि न्यूजीलैंड के साथ बातचीत पूरी हो चुकी है। भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (CETA) के 2026 में लागू होने की उम्मीद है।
चुनौतियां भी बरकरार
निर्यातकों का कहना है कि अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते और यूरोपीय संघ के साथ एफटीए पर प्रगति बेहद अहम होगी। यूरोपीय संघ में 1 जनवरी 2026 से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) लागू होने से भारतीय स्टील और एल्यूमीनियम निर्यात पर अतिरिक्त लागत बढ़ेगी।
टॉय एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनु गुप्ता ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ के चलते अगला साल अनिश्चित बना हुआ है। कुछ कंपनियों ने लागत के दबाव के कारण उत्पादन से जुड़े उपकरण वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों में स्थानांतरित कर दिए हैं।
आगे की राह
निर्यातकों का मानना है कि अमेरिका के साथ मौजूदा कारोबार का 50–60 प्रतिशत हिस्सा बना रहेगा। साथ ही, नए एफटीए के जरिए कच्चे माल की आसान उपलब्धता से इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की समस्या भी कम होगी। हालांकि, वैश्विक व्यापार नीतियों और जलवायु संबंधी नियमों पर भारत की रणनीति आने वाले समय में निर्णायक साबित होगी।