Friday, January 23

राहुल गांधी के सामने बड़ी चुनौती: पार्टी की अंदरूनी सियासत और पांच राज्यों के चुनावी समीकरण

 

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नई दिल्ली: 2025 बीजेपी के लिए कई मायनों में यादगार रहा। साल के अंत में बिहार चुनाव में मिली बंपर जीत ने पार्टी का उत्साह दोगुना कर दिया। वहीं, कांग्रेस लगातार हार का सामना कर रही है, जिससे पार्टी के भीतर राहुल गांधी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

 

2026 में केरल, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी (केंद्र शासित प्रदेश) में चुनाव होने हैं। इन राज्यों में राजनीतिक दलों के सामने अलग-अलग चुनौतियां हैं। चुनाव नतीजे चाहे जो भी हों, राष्ट्रीय राजनीति पर उनका असर सीमित रहेगा, लेकिन ये चुनाव राजनीतिक माहौल और भविष्य की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

 

बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए सबसे बड़ा परिक्षण होगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि पार्टी आगामी चुनाव में दो-तिहाई बहुमत से जीतकर ममता बनर्जी सरकार को सत्ता से हटाने का प्रयास करेगी। बीजेपी ने भ्रष्टाचार, कुशासन और घुसपैठियों के मुद्दों को उठाते हुए सत्ताधारी टीएमसी पर हमला तेज किया है। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी, लेकिन टीएमसी अभी भी राज्य में मजबूत राजनीतिक शक्ति बनी हुई है।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केरल और तमिलनाडु बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण राज्य बने हुए हैं। केरल में नगर निगम चुनावों में मिली सफलता को पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में बढ़ाने की उम्मीद कर रही है। तमिलनाडु में बीजेपी को डीएमके के शासन वाले राज्य में सहयोगी ढूंढना होगा। पूर्वोत्तर में असम के चुनाव बीजेपी की स्थिति की परीक्षा लेंगे, क्योंकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल चुनौती पेश कर रहे हैं।

 

राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए परीक्षा

राज्यों के चुनाव कांग्रेस और राहुल गांधी दोनों के लिए बड़ी चुनौती साबित होंगे। लगातार हार के बाद पार्टी के भीतर राहुल गांधी की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं। अब पार्टी के एक वर्ग की नजर प्रियंका गांधी वाड्रा पर भी है।

 

राहुल गांधी के लिए 2026 की शुरुआत इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि उन्हें कांग्रेस के चेहरे के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी। केरल में जीत उन्हें राजनीतिक मजबूती दे सकती है, जबकि असम का चुनाव कांग्रेस के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है। पार्टी ने राज्य में अपनी पकड़ खो दी थी और केंद्रीय नेतृत्व का गौरव गोगोई पर दांव परखा जाएगा, क्योंकि उनसे उम्मीद है कि वे अपने दिवंगत पिता तरुण गोगोई के पदचिन्हों पर चलने में सक्षम होंगे।

 

 

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