Thursday, June 25

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KK फैक्टर ने नीतीश को फिर बनाया ‘सीटों का शहंशाह’, कुर्मी-कुशवाहा ने दिलाया 100% इंक्रीमेंट

पटना।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही दृश्य लौट आया है, जिसने करीब ढाई दशक पहले नीतीश कुमार को सत्ता के केंद्र में पहुंचाया था। गुरुवार को जब नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उसी वक्त आंकड़े बता रहे थे कि कुर्मी-कुशवाहा गठजोड़, यानी KK फैक्टर, ने उन्हें विधान सभा में ऐतिहासिक बढ़त दिला दी है। जदयू ने इस चुनाव में पिछली बार की तुलना में 100% अधिक सीटें जीतीं—2020 के 43 से सीधे 85।

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कुर्मी-कुशवाहा का अभूतपूर्व समर्थन

243 सदस्यीय नई विधानसभा में कुर्मी समुदाय के 25 और कुशवाहा (कोइरी) समुदाय के 26 विधायक चुनकर आए हैं। 2020 में यह संख्या क्रमशः 10 और 16 थी। वहीं ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) विधायकों की संख्या भी 29 से बढ़कर 35 हो गई है।
सवर्ण विधायक भी इस बार मजबूत उपस्थिति दिखा रहे हैं—63 से बढ़कर 72

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कुर्मी-कुशवाहा समुदाय का यह संगठित समर्थन नीतीश की सत्ता वापसी का सबसे बड़ा आधार बना।

यादवों के बाद कुशवाहा दूसरी सबसे बड़ी जाति

बिहार सरकार के जाति सर्वेक्षण के अनुसार—

  • यादव: 14.26%
  • कुशवाहा: 4.21%
  • कुर्मी: 2.87%

यानी यादवों के बाद कुशवाहा बिहार की दूसरी सबसे बड़ी जाति है। कुर्मी समुदाय शिक्षा, नौकरियों और संगठन क्षमता के लिहाज से हमेशा मजबूत रहा है। नीतीश खुद इसी जाति से आते हैं, जिससे इस जातीय गठजोड़ का प्रभाव और बढ़ जाता है।

लालू युग के सामाजिक समीकरण को ऐसे तोड़ा नीतीश ने

सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ (JNU) के प्रोफेसर मनिंद्र नाथ ठाकुर के अनुसार,
कुर्मी-कुशवाहा जातियां मूल रूप से लव-कुश परंपरा से जुड़ी हैं और राजनीतिक रूप से साझा दिशा रखती हैं।
नीतीश के उदय के समय ये दोनों जातियां लालू यादव द्वारा बनाए गए उस बड़े सामाजिक गठबंधन से अलग हो गई थीं, जिस पर यादवों का दबदबा माना जाता था।

विखंडित ईबीसी समुदाय (26% आबादी) के साथ मिलकर आज ये दोनों जातियां NDA में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने की स्थिति में हैं।

इस चुनाव का असर, न कि स्थायी ट्रेंड: विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार इसे रास्ता बदलने वाला स्थायी समीकरण नहीं मानते। उनका कहना है कि—

  • जदयू के असाधारण प्रदर्शन के कारण इन जातियों की संख्या स्वतः बढ़ी है।
  • कुशवाहा-कुर्मी वोटरों के NDA से दूर होने की चर्चा गलत साबित हुई है।
  • जातीय गणित से ज्यादा असर चुनावी परिस्थितियों का रहा।

मुस्लिम और यादव प्रतिनिधियों की संख्या घटी

NDA की प्रचंड जीत का परिणाम महागठबंधन के मुख्य वोट बैंक पर साफ दिखा—

  • मुस्लिम विधायक: 11 (अब तक का सबसे कम)
  • यादव विधायक: 55 से घटकर 28

यानी RJD का परंपरागत सामाजिक आधार इस चुनाव में बुरी तरह सिमट गया।

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