
महाराष्ट्र की राजनीति में उपमुख्यमंत्री अजित पवार के अचानक निधन ने एनसीपी के दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अजित पवार इस प्रक्रिया के मुख्य धुरी थे और उनके बिना दोनों पक्षों में संतुलन बनाए रखना मुश्किल होगा।
विलय की कोशिशें और राजनीतिक पृष्ठभूमि
2023 में पार्टी के टूटने के बाद भी पवार परिवार और दोनों गुटों के नेताओं के बीच व्यक्तिगत सम्मान और संवाद बना रहा। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में दोनों गुटों के गठबंधन ने संकेत दिया कि चुनावों के बाद एनसीपी का विलय संभव है।
अजित पवार ने इस प्रक्रिया को अपने जीवन का प्राथमिक राजनीतिक उद्देश्य बताया था और इसे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने शरद पवार के मार्गदर्शन और आशीर्वाद को जरूरी माना।
अब फैसला मुश्किल
अजित पवार के जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच साझा निर्णय तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो गया है। एक ओर गुट के वरिष्ठ नेता ‘महायुति’ सरकार का हिस्सा बने रहना चाहते हैं, वहीं शरद पवार गुट के कई नेता अपनी फुले–शाहू–आंबेडकर विचारधारा से समझौता करने के पक्ष में नहीं हैं।
इसलिए एनसीपी का संभावित एकीकरण अब संगठनात्मक और वैचारिक दोनों दृष्टियों से परीक्षा बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजित पवार के बिना एनसीपी का भविष्य, गुटों के नेतृत्व और रणनीति की दिशा तय करना अब और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।