Thursday, January 29

अजित दादा के बिन महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण, गुटों और आरक्षण पर असर

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के अचानक निधन से राज्य की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। बारामती और पवार परिवार के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति में उनके जाने के बाद अब नए समीकरण उभर सकते हैं। सरकार, एनसीपी, मराठा राजनीति, आरक्षण आंदोलन और सहकारी क्षेत्र सभी इस घटना से प्रभावित होंगे।

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नेतृत्व का संकट

राज्य में वर्तमान में ट्रिपल इंजन’ सरकार चल रही है। अजित पवार के जाने के बाद उनके गुट में नेतृत्व शून्यता पैदा हो गई है। विधानसभा में अजित पवार गुट के 41 विधायक हैं, जबकि एकनाथ शिंदे के 57 और BJP के 132 विधायक हैं। बहुमत का आंकड़ा 145 का है। हालांकि सरकार पर तत्काल असर नहीं होगा, लेकिन गुट के भीतर नेतृत्व को लेकर असहमति की संभावना बढ़ गई है।

नए चेहरे और संभावनाएँ

शरद पवार गुट और अजित पवार गुट को मिलाने की संभावना बनी हुई है, लेकिन इसके लिए सर्वमान्य नेतृत्व अभी उभरता नहीं दिख रहा। पवार परिवार में तीन नाम प्रमुख हो सकते हैं – शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुळे, अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार और उनके पुत्र पार्थ पवार
सुप्रिया सुळे के पास शरद पवार गुट का नेतृत्व है, जबकि सुनेत्रा और पार्थ का राजनीतिक वजूद अभी स्थिर नहीं हुआ है। इसलिए तात्कालिक तौर पर सुनेत्रा को प्रमुख बनाना संभव हो सकता है।

मराठा राजनीति और आरक्षण आंदोलन

अजित पवार के जाने से मराठा राजनीति में भी रिक्तता पैदा हुई है। मराठा आरक्षण आंदोलन अब जोर पकड़ सकता है, जिससे मराठा नेताओं और OBC नेताओं के बीच टकराव बढ़ने की संभावना है।

सहकारिता और चीनी मिलों पर असर

अजित पवार ने पश्चिम महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलों में शरद पवार की चुनौती को टाला था। अब उनके न रहने से शरद पवार वहां सक्रिय हो सकते हैं, लेकिन सक्रियता कम होने से BJP को अवसर मिल सकता है, और शिंदे गुट उन्हें रोकने की कोशिश करेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अजित पवार के जाने से रिक्तता के साथ-साथ नए संघर्ष और समीकरण भी उभरेंगे। 2029 तक महाराष्ट्र की राजनीति में कई नए बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

 

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