Friday, June 12

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बिहार में 28 जनवरी की वो तारीख जब पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने सामना किया अविश्वास प्रस्ताव

पटना: बिहार की राजनीति में 28 जनवरी ऐतिहासिक तारीख के रूप में दर्ज है। 1968 में इसी दिन महामाया प्रसाद सिन्हा की गैर-कांग्रेसी सरकार अविश्वास प्रस्ताव के कारण गिर गई थी। प्रतिभा और देशभक्ति के धनी सिन्हा ने ICS की परीक्षा पास करने के बावजूद देश सेवा चुनी और गांधी जी के आंदोलन से जुड़कर जननायक बने।

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मुख्यमंत्री बनने का शानदार सफर
1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से दूर। संसोपा ने 68 सीटें जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया। महामाया प्रसाद सिन्हा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में केबी सहाय को पटना पश्चिम से हराकर राजनीतिक तहलका मचा दिया। इसके बाद उन्हें राजा कामाख्या नारायण सिंह के जनक्रांति दल में शामिल होने का आमंत्रण मिला, और परिणामस्वरूप 13 निर्दलीय विधायक उनके साथ आए। महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाकर बड़े जनादेश का सम्मान किया गया, जबकि कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बने।

मिली-जुली सरकार की चुनौतियां
सिन्हा ने कई दलों को जोड़कर सरकार बनाई थी, लेकिन मंत्रिपरिषद विरोधाभासों से भरी थी। तीन ऐसे मंत्री थे जो सदन के सदस्य नहीं थे—बीपी मंडल, बसंत नारायण सिंह और खलील अहमद। कांग्रेस से आए चार विधायकों को भी मंत्री बनाया गया। सत्ता लोलुपता और पद पाने की राजनीति के कारण मंत्रियों ने लगातार दबाव डाला।

बीपी मंडल और कांग्रेस की साजिश
मुख्यमंत्री सिन्हा ने बीपी मंडल को छह महीने के भीतर विधान परिषद का सदस्य बनाने से इंकार किया, जिससे बीपी मंडल ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के साथ मिलकर महामाया सरकार गिराने की साजिश रची। कांग्रेस ने यह सुनिश्चित किया कि बीपी मंडल को मुख्यमंत्री बनने का वादा मिले। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अनुमति के बाद कांग्रेस और बीपी मंडल ने अविश्वास प्रस्ताव के लिए मतदान किया।

अविश्वास प्रस्ताव पारित और इस्तीफा
25 जनवरी 1968 को विधानसभा में मतदान हुआ। महामाया सरकार के पक्ष में 150 जबकि विपक्ष में 163 वोट पड़े। इस प्रकार सरकार ने बहुमत खो दिया। फ्लोर टेस्ट में असफल होने के बाद मुख्यमंत्री सिन्हा ने 28 जनवरी 1968 को इस्तीफा दे दिया। उसी दिन सतीश प्रसाद सिंह शोषित दल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

28 जनवरी 1968 बिहार की राजनीति में न केवल अविश्वास प्रस्ताव के इतिहास की तारीख है, बल्कि यह लोकतंत्र और सियासी बहुमत की अस्थिरताओं की याद दिलाने वाला दिन भी है।

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