Friday, June 12

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ब्राह्मण राजनीतिक रूप से पिछड़े…आरक्षण का हकदार? सुप्रीम कोर्ट जांच करेगा

 

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नई दिल्ली: क्या ब्राह्मणों को पंचायतों और स्थानीय स्वशासन में राजनीतिक रूप से पिछड़े वर्ग (PBC) माना जा सकता है और उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट जल्द ही सुनवाई करेगा। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ही एक पूर्व फैसले का हवाला दिया गया है।

 

 

 

याचिका किसने दायर की?

 

गैर सरकारी संगठन ‘यूथ फॉर इक्वालिटी फाउंडेशन’ ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के माध्यम से यह याचिका दायर की है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के के कृष्ण मूर्ति मामले के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें 5 न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि “सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन जरूरी नहीं कि राजनीतिक पिछड़ेपन के समान हो।”

 

 

 

CJI सूर्यकांत की पीठ का रुख

 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि वह इस मुद्दे की जांच के लिए तैयार है। प्रथम दृष्टया पीठ ने यह भी कहा कि PBC वर्ग के लोग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) से होने चाहिए। यदि SEBC समुदायों में प्रतिनिधित्व कम है, तो उन्हें PBC के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, लेकिन इसका उल्टा सही नहीं है।

 

 

 

राज्यों ने PBC की पहचान नहीं की

 

सुप्रीम कोर्ट की 2010 की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि राज्य सरकारों को अपनी आरक्षण नीतियों में सुधार करना चाहिए। अनुच्छेद 243-डी(6) और 243-टी(6) के तहत लाभार्थियों को अनुच्छेद 15(4) के उद्देश्य से SEBC या कम प्रतिनिधित्व वाले पिछड़े वर्गों के साथ समान रूप से वर्गीकृत करना अनिवार्य नहीं है।

 

पीठ ने यह भी कहा कि शिक्षा और रोजगार में आरक्षण लाभ प्राप्त करने वाले समूहों को स्थानीय स्वशासन में आरक्षण देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि राजनीतिक भागीदारी में बाधाएं शिक्षा और रोजगार तक पहुंच को सीमित करने वाली बाधाओं के समान नहीं होतीं।

 

 

 

केवल SEBC को मिले आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र

 

शंकरनारायणन ने कहा कि 15 साल बीत जाने के बावजूद किसी भी राज्य ने PBC समुदायों की पहचान कर उन्हें आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र नहीं दिए हैं और केवल SEBC समुदायों को ही आरक्षित क्षेत्र प्रदान किए गए हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मुद्दे का परीक्षण करने पर सहमति जताई और महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा।

 

 

 

यह मामला स्थानीय स्वशासन और आरक्षण नीति के लिए नए सिरे से बहस की शुरुआत कर सकता है और आने वाले दिनों में इसका राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

 

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